मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी युवाओं, खासकर ‘जेन-जी’ को बदनाम करने की कोशिश: दीपांकर

मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी युवाओं, खासकर ‘जेन-जी’ को बदनाम करने की कोशिश: दीपांकर

मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी युवाओं, खासकर ‘जेन-जी’ को बदनाम करने की कोशिश:  दीपांकर
Modified Date: August 18, 2026 / 07:35 pm IST
Published Date: August 18, 2026 7:35 pm IST

पटना, 18 अगस्त (भाषा) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा)-मार्क्सवादी लेनिनवादी (माले) लिबरेशन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्वतंत्रता दिवस पर की गई ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी पर मंगलवार को पलटवार करते हुए इसे देश के युवाओं, खासकर ‘जेन-जी’ को बदनाम करने की कोशिश बताया।

पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने संवाददाताओं से कहा कि इससे पहले लोगों को बदनाम करने के लिए ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया और अब प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ जैसा नया शब्द गढ़ा है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह देश के युवाओं, विशेषकर जेन-जी को बदनाम करने की कोशिश है।’’

प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत में सशस्त्र नक्सली हिंसा समाप्त होने के कगार पर है लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ या बौद्धिक नक्सल की एक छिपी हुई चुनौती देश में अराजकता फैलाने और युवाओं को गुमराह करने का सक्रिय प्रयास कर रही है। भट्टाचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी केवल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि सवाल पूछने, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने और सरकार की नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करने वाले लोगों पर भी निशाना साधती है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब युवा रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, लोकतंत्र और अपने भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं तब उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ बताकर बदनाम करना स्वीकार्य नहीं है।’’

भट्टाचार्य ने सवाल किया कि अगर प्रधानमंत्री का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान नीतियां बनाने में माओवादी सोच वाले लोग शामिल थे, तो क्या वह मनरेगा और जनता के हित में बनाए गए अन्य कानूनों को भी उसी सोच का परिणाम मानते हैं?

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की राजनीति का संदेश यह है कि लोगों को सरकार से सवाल नहीं करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से नहीं सोचना चाहिए बल्कि ‘‘अंध अनुयायी’’ बने रहना चाहिए।

भाकपा माले के नेता ने सवाल किया, ‘‘कांग्रेस-मुक्त भारत के नारे के बाद क्या प्रधानमंत्री अब ‘दिमाग-मुक्त भारत’ बनाना चाहते हैं?’’

भट्टाचार्य ने कहा कि युवाओं के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें बदनाम करना सरकार की कमजोरी को दर्शाता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के भाषण में बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसी गंभीर समस्याओं के ठोस समाधान नहीं बताए गए।

भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘देश के युवा डरने वाले नहीं हैं। वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए सवाल पूछते रहेंगे और अपनी आवाज उठाते रहेंगे।’’

भाषा कैलाश जितेंद्र

जितेंद्र


लेखक के बारे में