बतंगड़ः बपौतीवाद की विदाई
वंशवाद के खिलाफ चलाई गई भाजपा की मुहिम का असर अब दिखाई देने लगा है। बिहार से लालू प्रसाद यादव के विरासत को मिली करारी हार के बाद महाराष्ट्र के नगरीय निकाय नतीजे में भविष्य की राजनीति के गहरे संकेत छिपे हैं।
- सौरभ तिवारी
यूं कहने को तो भारत में लोकतंत्र है, लेकिन इसका अंदरूनी मिजाज अब भी राजशाही वाला ही बना हुआ है। यानी सत्ता भले राजवंशों के हाथ से निकल कर लोकतंत्र के जरिए दलीय नेताओं के हाथों में आ गई लेकिन इन नेताओं ने कालांतर में अपना-अपना सियासी वंशवाद खड़ा करके अप्रत्यक्ष रूप से देश में लोकतांत्रिक राजशाही ही स्थापित कर रखी है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अमुमन हर राज्य में किसी ना किसी सियासी राजवंश का दबदबा नजर आ जाएगा। केंद्र में ये सिलसिला नेहरू के बाद गांधी सरनेम के साथ जारी है तो राज्यों में भी अपना-अपना सियासी कुनबा है। लेकिन महाराष्ट्र में हालिया हुए नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों ने भारतीय लोकतंत्र से सियासी वंशवाद या ठेठ शब्दों में कहें तो राजनीति से ‘बपौतीवाद’ की विदाई के संकेत दे दिए हैं।
वंशवाद के खिलाफ चलाई गई भाजपा की मुहिम का असर अब दिखाई देने लगा है। बिहार से लालू प्रसाद यादव के विरासत को मिली करारी हार के बाद महाराष्ट्र के नगरीय निकाय नतीजे में भविष्य की राजनीति के गहरे संकेत छिपे हैं। इस संकेत में संदेश और सबक दोनों निहित हैं। महाराष्ट्र में भाजपा ने साम-दाम-दंड-भेद के जरिए दो-दो सियासी कुनबों को धूल चटाई है। इनमें से एक कुनबा ठाकरे ब्रदर्स का रहा जबकि दूसरा पवार का। बिहार के बाद महाराष्ट्र से वंशवादी राजनीति के सफाए के उपरांत भाजपा के टारगेट में वे राज्य हैं जहां सियासत को जागीर की तरह चलाने का चलन है। इनमें से फिलहाल उसका फोकस तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल पर है जहां इस साल चुनाव होने हैं।
महाराष्ट्र के नतीजों ने ‘राजनीतिक जागीरदारों’ को ये साफ संदेश दे दिया है कि राजनीति में बपौतीवाद के दिन अब चला-चली की बेला में है। राजनीतिक उत्तराधिकारियों को ये बात समझ लेनी चाहिए कि महज विरासत के बलबूते जनता को बरगला पाना अब आसान नहीं रह गया है। सियासी विरासत को महज भावनात्मक आधार पर आगे बढ़ा पाना उत्तराधिकारियों के कौशल पर निर्भर करता है और महाराष्ट्र के नतीजे इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि बाला साहब ठाकरे की विरासत को संभाल पाने में उनके उत्तराधिकारी सिरे से नाकाम रहे हैं। कहां बाला साहेब ठाकरे का गर्वित हिंदुत्व और कहां उनके वारिसों की हिंदुत्वविमुख लिजलिजी विचारधारा। इस विचारात्मक विरोधाभास का नतीजा भाजपा की आशातीत सफलता के रूप में सबके सामने हैं।
ये बात आइने की तरफ साफ है कि जनता का अब परिवारवादी पार्टियों से मोहभंग हो चला है। जनता ये बात जान चुकी है कि जिन सियासी दिग्गजों ने अपने संघर्ष और कथित विचारधारा के बलबूते अपना वैचारिक आधार बनाया था, उसे संभाल पाने में उनके वारिस सर्वथा नाकाम साबित हो रहे हैं। अब केवल अपने राजनीतिक पूर्वजों के अतीत और कृतित्व का यशोगान करके सियासत नहीं चलाई जा सकती। ये बात कांग्रेस समेत दूसरे क्षेत्रीय दलों के झंडाबरदारों को जितनी जल्दी समझ में आ जाए उतना बेहतर है। वरना कभी ईवीएम, कभी वोटर लिस्ट तो कभी चुनाव आयोग पर तोहमत मढ़कर अपनी नाकामी को जस्टीफाई करने का विकल्प तो खुला ही है।
– लेखक IBC24 में डिप्टी एडिटर हैं।
Disclaimer- आलेख में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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