बतंगड़ः अभिषेक के ‘अंडाभिनंदन’ पर क्रंदन

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बतंगड़ः अभिषेक के 'अंडाभिनंदन' पर क्रंदन: Outcry over Abhishek's 'Egg-Greeting'

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  • Publish Date - June 2, 2026 / 01:14 PM IST,
    Updated On - June 2, 2026 / 01:15 PM IST

  • सौरभ तिवारी

नेताओं के खिलाफ जनाक्रोश की अभिव्यक्ति के कई मामले समय-समय पर आते रहे हैं। कभी किसी नेता को सरेआम थप्पड़ रसीद दिया गया, तो कभी किसी की थाने में सुटाई हो गई। देश में स्याही से मुंह काला करने का भी एक दौर चला था, जिसके शिकार तमाम नेता हुए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल की जगह जूता उछाले जाने की कई घटनाओं का भी देश साक्षी बन चुका है।

जनाक्रोश का शिकार बनने वाले शूरमाओं की लिस्ट में अभिषेक बनर्जी का नाम भी जुड़ गया है। नाम तो सुना ही होगा। ममता दीदी के लाडले भतीजे…। हां-हां…वही, 4 जून के बाद गृहमंत्री अमित शाह को देख लेने की धमकी देने वाले। इन्ही अभिषेक का बंगाल के लोगों ने ‘अंडाभिनंदन’ कर दिया है। अभिषेक अपने समर्थकों का कुशल क्षेम पूछने के लिए सोनारपुर गए थे। लोगों को जैसे ही उनके आने की खबर लगी, वे खातिरदारी की पूरी तैयारी के साथ बेकरारी में उनका इंतजार करने लगे। बैकग्राउंड में गाना बज रहा था- आइए, आपका इंतजार था…देर लगी आने में तुमको, शुक्र है फिर भी आए तो…। और जैसे ही अभिषेक पहुंचे, लोगों ने मेरा पिया घर आया…जयश्री राम जी….का कोरस गान करते हुए स्वागत में अंडे रूपी पुष्प बरसाने शुरू कर दिए। अभिषेक के चेहरे से अंडों की पीली जर्दी लोगों का प्यार बनकर बह निकली। अभिषेक बड़ी मुश्किल से हेलमेट लगाकर चेहरे से टपकते ‘अंडानुराग’ को छिपा पाए।

सुनारपुर में ‘भाइपो’ पर बरसी ‘कृपा’ से उनकी पार्टी के एक और नेता को अपना ‘कल्याण’ कराने की हूक उठी। अपनी मिमिक्री और मसखरी से लोगों का दिल बहलाने वाले ये नेताजी भी अपना सत्कार कराने के लिए बीच सड़क पर ललकार उठे। लेकिन जब लोगों ने ‘कृपा’ नहीं बरसाई, तो एक्टिंग में माहिर इन जनाब ने खुद ही पत्थर पीड़ित के रूप में पेश कर दिया। लोगों को उनकी ये ओवर एक्टिंग कतई पसंद नहीं आई और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी।

अभिषेक के बाद कल्याण के साथ हुए अकल्याण से देश में निंदा का दौर शुरू हो गया है। इस निंदा का स्वरूप दोतरफा है। ‘निंदानाथ’ की पार्टी वाले इस घटना की स्माइल इमोजी के साथ ‘निंदा’ करते हुए अंडे पर नमक छिड़क रहे हैं, तो वहीं ममता के साथ समता दिखाने वाले दल अंडे-टमाटर के रूप में लोकतंत्र पर मंडराते नये खतरे की निंदा करने में जुट गए हैं। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र पर उमड़-घुमड़ आए इस नये खतरे के प्रति जाहिर की जा रही चिंता वाकई बड़ी ‘क्यूट’ है।

पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात पर चिंता जाहिर करने वाले टीएमसी नेताओं के बयानों पर वाकई बलैयां लेने का मन करता है। कहां पिछले 15 सालों के अमन-ओ-सुकून वाले लोकतांत्रिक दिन और कहां अंडे-टमाटर वाले अलोकतांत्रिक दिन? कहां घुसपैठियों और स्थानीय के बीच बगैर भेदभाव वाले ‘ममतामयी’ दिन, और कहां घुसपैठियों का हक छीनने वाले ये मानवताविरोधी दिन।

अभी पश्चिम बंगाल में सुवेंदु को ‘सत्ता का अधिकारी’ बने माह भर भी नहीं हुआ है, और उन्होंने जिस अंदाज में अपनी पारी शुरू की है, उससे साफ जाहिर है कि आने वाले दिनों में भी तमाशेबाजी का ये दौर यूं ही शब-ओ-रोज़ चलता रहेगा। चचा गालिब के अंदाज में कहें तो- बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल* है दुनिया मिरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे। अब इसे क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया वाला न्यूटन का सिद्धांत माने या फिर तुलसी बाबा की नसीहत सच्चाई तो यही है कि, ‘करम प्रधान बिस्व करि राखा, जो जस करई सो तस फलु चाखा।’

(बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल: बच्चों का खेल का मैदान या खिलौना)

-लेखक IBC24 में डिप्टी एडिटर हैं।

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