NindakNiyre: मुसलमानों पर भरोसा नहीं कर रही दुनिया, क्यों?

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  • Publish Date - February 3, 2026 / 10:48 PM IST,
    Updated On - February 3, 2026 / 10:48 PM IST

Barun Sakhajee New Column for insights, analysis and political commentary

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

 

कोई मर गया, किसी ने अपराध कर दिया, कोई ठगा गया, कोई रास्ते से जा रहा है, कोई खाना खा रहा है, कोई चल रहा है, कोई दौड़ रहा है, कोई आ रहा है, कोई जा रहा है, कोई घूम रहा है, कोई बैठा है, कोई अफसर है, कोई नेता है, कोई पत्रकार है, कोई डॉक्टर है, कोई धार्मिक है, कोई अधार्मिक है, कोई नास्तिक है, कोई आस्तिक है, कोई ओबीसी है, कोई जनरल है, कोई एससी, है कोई एसटी है। कोई फर्क ज्यादा पड़ता नहीं, लेकिन कोई अगर मुस्लिम है और कोई हिंदू है तो फर्क पड़ता है। बहुत फर्क पड़ता है।

 

ऐसा क्या हो गया है। कुछ तो भी नहीं हुआ। बस रिटेलिएशन है। लेकिन यह सिर्फ भारत में नहीं हुआ है या हो रहा है, पूरी दुनिया में हो रहा है। पूरी दुनिया में मुस्लिमों पर भरोसा नहीं किया जा रहा। यह स्थिति अच्छी नहीं है। न ही यह स्थिति स्वीकार्य होनी चाहिए। बेशक, सिस्टम, नीति, कानून शब्दों में इस तरह के किसी भेद-फर्क की स्वीकार्यता नहीं, न ही किसी तरह से क्रियान्वित करते, मगर व्यवहार में ऐसा होता है। नतीजे में मुस्लिमों में उपेक्षा, पीड़ा और तनाव का माहौल है। शक नहीं कर सकते कि मुसलमान अपने पंथ को लेकर अत्यधिक कट्टर और पंथांध होते हैं। कुफ्र के इर्दगिर्द घूमते इस विचार ने दुनिया में अशांति पैदा की है। शंकर स्वरूप साकार है, शिव स्वरूप निराकार, दोनो एक हैं, इसमें किसे शक है। धर्म तो जीवन बदलने का नाम होता ही है, पंथ भी कोई गुट बनाकर अनुयायियों की संख्या बढ़ाने का नाम नहीं है। पंथ दूसरे पंथ से वैचारिक धरातल पर कुछ जुदा हो सकता है, लेकिन एक दूसरे का मखौल उड़ाकर उसके अनुयायियों को नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर सकता। कत्लेआम तो कतई नहीं।

 

समझने की जरूरत है, भारत की उपेक्षा मुस्लिमों पर इस कालखंड में भारी पड़ रही है। आवश्यक भले नहीं है, लेकिन मुसलमानों की उपेक्षा भी कहीं भारत पर भारी न पड़ जाए। कोई रास्ता निकालना होगा। कोई राब्ता करनी होगी। कोई समन्वय बनाना होगा। शंका कम, बुद्धियां भी कम हैं। इसलिए डीएनए ट्रैक की विज्ञानिक कहानी से काम चलेगा नहीं। जब जहालत इस लेवल की है तो इतना टिपीकल डीएनए साइंस कैसे समझ आएगा।

 

बहरहाल, इतना ही कहा जाए, उपेक्षा नहीं प्रेम कीजिए, बदले में मुसलमान भी सिर्फ प्रेम करना सीखें। दुख नहीं होगा किसी की आजीविका इस तरह से छेड़ी जाएगी तो वह करेगा ही क्या? परिवारों के अस्तित्व जब दांव पर होंगे तो वह करेगा ही क्या? पंथ हमे समझ नहीं आता, लेकिन झगड़ा भरपूर समझते हैं।

 

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