Supreme Court Verdict SC Status: क्रिश्चियन फोरम ने SC के फैसले को बताया ‘तथ्यात्मक रूप से गलत’.. छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण क़ानून को कोर्ट ले जानी की कही बात
Christian Forum on Supreme Court Verdict: छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम ने सुप्रीम कोर्ट के SC आरक्षण निर्णय को तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया।
Christian Forum on Supreme Court Verdict || Image- ANI News File
- SC आरक्षण ईसाई धर्म अपनाने पर समाप्त
- क्रिश्चन फोरम ने फैसले पर दी प्रतिक्रिया
- सरकारी लाभ और आरक्षण का दावा नहीं
रायपुर: छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने पर अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण समाप्त करने का निर्णय तथ्यात्मक रूप से गलत है। (Christian Forum on Supreme Court Verdict) उन्होंने बताया कि अदालत ने 1950 के राष्ट्रपति अध्यादेश के आधार पर यह फैसला दिया, जो कभी कानून नहीं बन पाया। पन्नालाल ने यह दावा भी किया कि, छत्तीसगढ़ सरकार के प्रस्तावित धार्मिक स्वातंत्र्य कानून को अदालत में चुनौती देंगे।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का SC स्टेटस पर फैसला?
गौरतलब है कि, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धर्मांतरण से जुड़े मामले पर अपना मत स्पष्ट किया है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि, कि कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर इस स्थिति का अधिकार समाप्त हो जाता है।
नहीं कर सकता सरकारी लाभ, आरक्षण या सुरक्षा का दावा
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति पीके मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजरिया शामिल थे। उन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि जो लोग ईसाई धर्म अपनाते हैं और उसका सक्रिय रूप से पालन करते हैं, (Christian Forum on Supreme Court Verdict) वे अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं रख सकते। कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जातियों) आदेश, 1950 की धारा 3 का हवाला देते हुए कहा कि इस स्थिति पर कोई अपवाद नहीं है। जो व्यक्ति इस सूचीबद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है, वह SC के तहत किसी भी सरकारी लाभ, आरक्षण या सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
पढ़ें क्या है पूरा मामला
यह निर्णय एक ऐसे मामले में आया है, जिसमें एक व्यक्ति ने ईसाई धर्म अपनाकर पादरी के रूप में कार्य किया और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत हमला और जाति आधारित उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोपी ने दावा किया कि धर्मांतरण के बाद शिकायतकर्ता अब इस अधिनियम के तहत सुरक्षा के हकदार नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने दस वर्षों से ईसाई धर्म का पालन किया और नियमित प्रार्थना बैठकें आयोजित कीं, और कोई प्रमाण नहीं है कि उसने मूल धर्म में पुनः प्रवेश किया या अपनी जाति समुदाय में वापसी की। (Christian Forum on Supreme Court Verdict) कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जाति प्रमाणपत्र का होना या रद्द न होना, धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति के लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
Supreme Court: No person who professes a religion other than Hindu, Sikh or Buddhist shall not be a member of Scheduled caste.
CONVERSION to any other religion results in LOSS of Scheduled caste status.#SupremeCourtOfIndia #supremecourt
— Bar and Bench (@barandbench) March 24, 2026
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