भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भारत में सीबीआरएन व साइबर खतरों का जोखिम बढ़ा: रिपोर्ट
भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भारत में सीबीआरएन व साइबर खतरों का जोखिम बढ़ा: रिपोर्ट
नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) भारत की भू-राजनीतिक स्थितियां, तेजी से बढ़ता औद्योगिक विकास एवं शहरीकरण की रफ्तार देश को साइबर हमलों तथा रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) खतरों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना रही हैं। सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई।
रिपोर्ट में सीबीआरएन सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
सीबीआरएन रक्षा एवं ऐसे खतरों से निपटने के उपायों पर यह रिपोर्ट यहां पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) के एक सम्मेलन में जारी की गई।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘ सीबीआरएन सुरक्षा रणनीति को मजबूत करना अब और अधिक जरूरी हो गया है, खासकर तब जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहे हैं।’’
इसमें कहा गया कि भारत के लिए इस चुनौती का सामना करने के लिए ऐसी तैयारी की जरूरत है जो बदलते खतरों की गति एवं जटिलता के अनुरूप हो। इसके लिए निवेश, समन्वय, नवाचार और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सभी हितधारकों के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक है।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘ यूक्रेन संघर्ष यह दर्शाता है कि रासायनिक एजेंट (जिनमें औद्योगिक रसायन भी शामिल हैं जिन्हें पारंपरिक रूप से ‘रासायनिक युद्ध एजेंट’ नहीं माना जाता) आधुनिक संघर्ष में तेजी से हथियार में बदले जा सकते हैं और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। भारत की नीतियों, पहचान प्रणालियों और सुरक्षात्मक उपकरणों को इस विस्तारित खतरे के दायरे को ध्यान में रखना होगा जिसमें ड्रोन के जरिये बड़े क्षेत्रों में रसायनों का प्रसार भी शामिल है।’’
राष्ट्रीय रासायनिक हथियार अभिसमय प्राधिकरण (एनएसीडब्ल्यूसी) की चेयरपर्सन रोली सिंह ने कहा कि साइबर सुरक्षा एवं सीबीआरएन अवसंरचना का आपसी संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कार्यक्रम में कहा, ‘‘ भविष्य की तैयारी में साइबर मजबूती को औद्योगिक सुरक्षा प्रणालियों के साथ जोड़ना होगा। साइबर हमले आईटी आधारित संवेदनशील औद्योगिक प्रणालियों को निशाना बना सकते हैं। इससे महत्वपूर्ण अवसंरचना में गंभीर दुर्घटनाएं एवं व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं।’’
सिंह ने कहा कि सरकार और उद्योग के बीच सहयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है और इसमें उद्योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, ‘‘ आज उद्योग खतरनाक रसायनों, जैविक सामग्री और संवेदनशील औद्योगिक प्रक्रियाओं से जुड़े अवसंरचना के बड़े हिस्से का स्वामित्व एवं संचालन करता है… इसलिए रोकथाम की शुरुआत संयंत्र स्तर से ही होनी चाहिए।’’
सिंह ने कहा कि जहां सरकार की भूमिका नियामकीय निगरानी और समन्वय प्रदान करना है..वहीं उद्योग प्रौद्योगिकी विशेषज्ञता, परिचालन अनुभव, नवाचार एवं आपूर्ति श्रृंखला की समझ के जरिये योगदान दे सकता है।
भाषा निहारिका अजय
अजय

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