एसोचैम ने 2026-27 के बजट में हाइड्रोजन आधारित इस्पात निर्माण,हरित वित्त के लिए प्रोत्साहन की मांग की
एसोचैम ने 2026-27 के बजट में हाइड्रोजन आधारित इस्पात निर्माण,हरित वित्त के लिए प्रोत्साहन की मांग की
नयी दिल्ली, आठ जनवरी (भाषा) उद्योग निकाय एसोचैम ने सरकार से आगामी बजट में हाइड्रोजन आधारित ‘डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन’ (डीआरआई) तकनीक को अपनाने के लिए प्रोत्साहन देने और इस्पात कंपनियों को इस बदलाव में मदद के लिए रियायती दरों पर हरित वित्त उपलब्ध कराने का आह्वान किया है ताकि स्वच्छ एवं टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों में निवेश को बढ़ावा मिल सके।
‘डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन’ (डीआरआई) लोहे के उत्पादन की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें लौह अयस्क (आयरन ओर) को पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस की बजाय कम तापमान पर गैस या हाइड्रोजन की मदद से सीधे लौह में बदला जाता है। इससे कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम होता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी 2025 को संसद में वित्त वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश कर सकती हैं।
एसोचैम ने घरेलू इस्पात क्षेत्र के लिए कुछ बजट पूर्व सुझाव दिए हैं। इन सुझावों के तहत ‘वेस्ट-हीट रिकवरी सिस्टम’ (उद्योगों से निकलने वाली बेकार गर्मी को फिर से ऊर्जा में बदलने वाली प्रणालियों) को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। इसके अलावा, इस्पात संयंत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा आधारित निजी बिजली संयंत्र स्थापित करने का सुझाव भी दिया गया है ताकि स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़े एवं कार्बन उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।
उद्योग निकाय ने कहा कि कार्बन उत्सर्जन कम करना एक चुनौती एवं प्रतिस्पर्धात्मक अवसर दोनों प्रस्तुत करता है और यह दावा किया कि ये उपाय टिकाऊ उत्पादन को गति दे सकते हैं।
एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने ‘स्क्रैप’ इकट्ठा करने और पुनर्चक्रण को प्रोत्साहन देने की वकालत करते हुए कहा कि देश की आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए कौशल विकास के माध्यम से घरेलू पुनर्चक्रण अवसंरचना को मजबूत करना आवश्यक है।
चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उद्योग निकाय ने कहा कि चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक होने और आठ से नौ प्रतिशत की वृद्धि दर बनाए रखने के बावजूद यह क्षेत्र महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है।
प्रमुख कच्चे माल की उच्च लागत, रुपये में गिरावट और घरेलू खनन योग्य भंडार के नगण्य होने के कारण आयातित कोकिंग कोयले पर अत्यधिक निर्भरता प्रमुख समस्याएं बनी हुई हैं।
इसके अलावा, एसोचैम ने कहा कि लौह अयस्क का उत्पादन स्थिर है और नीलाम की गई कई खदानों में अभी तक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। इस्पात की बढ़ती मांग तथा लौह अयस्क के निरंतर निर्यात से आपूर्ति पर दबाव पड़ रहा है जिसके परिणामस्वरूप घरेलू मिल के लिए लागत बढ़ रही है।
एसोचैम का मानना है कि आगामी केंद्रीय बजट ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत को इस्पात एवं मूल्यवर्धित उत्पादों के वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
निकाय ने इसे हासिल करने के लिए लौह अयस्क शोधन को बढ़ावा देने, महत्वपूर्ण कच्चे माल पर आयात शुल्क हटाने और दोहरे कराधान को समाप्त करने के लिए ‘रॉयल्टी’ गणना को युक्तिसंगत बनाने का आह्वान किया है।
एसोचैम ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस्पात पुनर्चक्रण, मिश्र धातु नवाचार तथा प्रक्रिया डिजिटलीकरण में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन देने से उत्पादकता बढ़ेगी और विशेष इस्पात आयात पर निर्भरता कम होगी।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा

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