पर्यावरण उल्लंघन पर मुआवजा तय करने में कंपनी का कारोबार अहम: उच्चतम न्यायालय
पर्यावरण उल्लंघन पर मुआवजा तय करने में कंपनी का कारोबार अहम: उच्चतम न्यायालय
नयी दिल्ली, 30 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि यदि कोई कंपनी अपने बड़े पैमाने पर संचालन की वजह से अधिक लाभ अर्जित करती है, तो उसे पर्यावरण को होने वाले नुकसान की अधिक जिम्मेदारी भी उठानी होगी।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के एक आदेश को बरकरार रखते हुए की, जिसमें हरित मानदंडों के उल्लंघन पर एक बिल्डर पर पांच करोड़ रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में किसी कंपनी के कारोबार, उत्पादन स्तर या राजस्व जैसे पैमाने को पर्यावरणीय क्षति से जोड़ना मुआवजा तय करने का एक प्रभावी आधार हो सकता है।
पीठ ने कहा कि बड़े पैमाने पर कंपनी का संचालन आमतौर पर अधिक संसाधनों के उपयोग, अधिक उत्सर्जन और अधिक अपशिष्ट से जुड़ा होता है, जिससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ता है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि कोई कंपनी अपने बड़े कारोबार से अधिक मुनाफा कमाती है, तो यह वाजिब है कि वह पर्यावरणीय लागत की बड़ी जिम्मेदारी उठाए। संचालन पैमाने को पर्यावरणीय प्रभाव से जोड़ना यह संदेश देता है कि बड़ी कंपनियों को हरित नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा।’’
पीठ ने कहा कि किसी कंपनी का अधिक कारोबार बड़े पैमाने पर उसके संचालन को दर्शाता है। अगर ऐसी कंपनी के कामकाज से पर्यावरण को गंभीर नुकसान होता है, तो कारोबार और क्षति के स्तर के बीच सीधा संबंध हो सकता है।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इस तरह, यह कहना गलत होगा कि मुआवजा तय करते समय कंपनी के कारोबार को कभी भी प्रासंगिक कारक नहीं माना जा सकता है।’’
यह टिप्पणी पुणे के औटाडे हांडेवाड़ी क्षेत्र में एक परियोजना से जुड़े मामले में आई। एनजीटी ने 2022 में अपने आदेश में कहा था कि ‘रिद्म काउंटी’ ने पर्यावरणीय मंजूरी लिए बगैर निर्माण कार्य किया और हरित मानदंडों का उल्लंघन किया। इसके लिए उसे पांच करोड़ रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
अजय

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