आर्थिक समीक्षा ने स्वैच्छिक फसल विविधीकरण का समर्थन किया

आर्थिक समीक्षा ने स्वैच्छिक फसल विविधीकरण का समर्थन किया

आर्थिक समीक्षा ने स्वैच्छिक फसल विविधीकरण का समर्थन किया
Modified Date: January 29, 2026 / 07:25 pm IST
Published Date: January 29, 2026 7:25 pm IST

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बदलाव करने या खरीदारी को कमजोर करने के बजाय स्वैच्छिक फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए।

संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत संरचनात्मक रूप से खाद्य तेलों, दालों और कुछ फीडस्टॉक के आयात पर निर्भर है, जिससे खाद्य सुरक्षा ढांचे को बनाए रखते हुए बदलती उपभोग पद्धति, पर्यावरणीय स्थिरता और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के साथ कृषि सहायता का बेहतर ढंग से तालमेल बिठाने का अवसर मिलता है।

आर्थिक समीक्षा में बृहस्पतिवार को कहा गया, ‘‘एमएसपी में बदलाव करने या खरीद को कमजोर करने के बजाय, एक सुस्पष्ट रणनीति बेहतर स्टॉक प्रबंधन से होने वाली बचत का उपयोग स्वैच्छिक फसल विविधीकरण का समर्थन करने के लिए कर सकती है।’’

किसानों को चावल और गेहूं की खेती के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक विकल्प दिए जा सकते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां खरीद की मात्रा अधिक है लेकिन खेती से मुनाफा कम है और कृषि-पारिस्थितिकी अन्य फसलों के लिए अनुकूल हैं।

शुरुआती चरण, पूर्वी और मध्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, जहां वर्षा पद्धति, मिट्टी की स्थिति और बाजार तक पहुंच दलहन, तिलहन और मक्का को आर्थिक रूप से लाभप्रद बनाती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बाद में शामिल किया जा सकता है, जब यह दृष्टिकोण परखा जा चुका हो।

समीक्षा में कहा गया है कि फसल का चुनाव कृषि-जलवायु उपयुक्तता और बाजार की मांग के आधार पर होगा। पूर्वी भारत में, मक्का, दलहन और तिलहन मौजूदा फसल प्रणालियों में उपयुक्त बैठते हैं। मध्य क्षेत्रों में, चना और सोयाबीन जैसे तिलहन प्रचलित वर्षा और मिट्टी की स्थितियों के अनुकूल हैं।

ये फसलें राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का समर्थन करती हैं: खाद्य तेल और दालें आयात पर निर्भरता कम करती हैं, जबकि मक्का और तिलहन एथेनॉल, पशुधन और जैव ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में योगदान करते हैं।

इसमें कहा गया है कि प्रति क्विंटल या प्रति एकड़ प्रोत्साहन उपज के अंतर और लागत की भरपाई कर सकते हैं। कई राज्यों के अनुभव से पता चलता है कि मामूली बोनस वैकल्पिक फसलों को आर्थिक रूप से आकर्षक बना सकते हैं, खासकर जब पानी, उर्वरक और ऊर्जा के लिए कम आदान लागत के साथ जोड़ा जाता है।

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है, ‘‘इन प्रोत्साहनों को अतिरिक्त स्टॉक और वहन लागत को कम करके बनाई गई राजकोषीय बचत से वित्तपोषित किया जा सकता है, जिससे यह दृष्टिकोण राजकोषीय रूप से तटस्थ रहता है और साथ ही किसान-केंद्रित भी रहता है।’’

राज्य-स्तरीय विविधीकरण मिशन केंद्र-राज्य साझेदारी के माध्यम से लागू किए जाएंगे।

इसमें कहा गया है कि समय के साथ, सरकारी दखल हाजिर खरीद से हटकर ज़्यादा फसलों के लिए बाज़ार बनाने की दिशा में जा सकता है। सरकार, किसानों की आय को स्थिर करने और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कीमत अंतर भुगतान, बोनस और पक्की खरीद प्रणाली पर ज़्यादा भरोसा कर सकती है।

समीक्षा में कहा गया है कि खरीद की मात्रा और बफर नियमों में स्वचालित पुनर्समायोजन के ज़रिये खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रहती है।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय


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