यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली के विस्तार से निर्यातकों पर पड़ेगा असर: जीटीआरआई
यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली के विस्तार से निर्यातकों पर पड़ेगा असर: जीटीआरआई
नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) शोध संस्थान जीटीआरआई ने बृहस्पतिवार को कहा कि यूरोपीय संघ अपने कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली (सीबीएएम) का विस्तार करने की योजना बना रहा है। इस कदम से यूरोप को निर्यात होने वाले भारत में विनिर्मित उत्पादों पर कार्बन कर का दायरा बढ़ है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि यूरोप में निर्यात करने वाले भारतीय निर्यातकों को देश के प्रमुख निर्यात बाजारों में से एक में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए उत्सर्जन लेखांकन, आपूर्ति श्रृंखला का पता लगाने की क्षमता और कार्बन उत्सर्जन में कमी के उपायों में निवेश में तेजी लाने की जरूरत पड़ सकती है।
यूरोपीय संसद की पर्यावरण, जलवायु और खाद्य सुरक्षा समिति (ईएनवीआई) ने दस अप्रैल, 2026 को जारी एक मसौदा रिपोर्ट में सीबीएएम व्यवस्था में पांच प्रमुख बदलावों का प्रस्ताव रखा है।
जीटीआरआई ने कहा कि इन बदलावों में एक जनवरी, 2028 से लगभग 180 अतिरिक्त इस्पात और एल्यूमीनियम आधारित विनिर्मित उत्पादों तक सीबीएएम का विस्तार करना और कबाड़ आधारित उत्पादन के लिए लेखांकन नियम को सख्त करना शामिल है।
इसमें ज्यादा क्षेत्रों में बिजली के उपयोग से होने वाले अप्रत्यक्ष उत्सर्जन के लिए व्यवस्था के विस्तार की जांच करना भी शामिल है।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘इन कदमों से सीबीएएम को मुख्य रूप से इस्पात और एल्युमीनियम कच्चे माल पर लगने वाले कर से बदलकर एक व्यापक कार्बन कर में बदला जा सकेगा, जिसमें औद्योगिक विनिर्मित वस्तुएं भी शामिल होंगी।’’
सीबीएएम यूरोपीय संघ का कार्बन कर है। इसके तहत यूरोप के बाहर उत्पादित वस्तुओं में उत्सर्जन के लिए आयातकों से शुल्क लिया जाता है।
यह प्रभावी रूप से यूरोपीय संघ में बिक्री करने वाले विदेशी विनिर्माताओं पर कार्बन कर लगाता है। यह व्यवस्था कार्बन-गहन आयातों पर जलवायु-संबंधी व्यापार अवरोध के रूप में कार्य करती है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विस्तार से कई नए उत्पाद सीबीएएम के दायरे में आ जाएंगे। इनमें गढ़े हुए धातु उत्पाद, ट्यूब, पाइप, फास्टनर, संरचनात्मक उपकरण, मशीनरी कल- पुर्जे, एल्यूमीनियम कंटेनर और अन्य अर्ध-निर्मित और तैयार इंजीनियरिंग वस्तुएं शामिल हैं।
श्रीवास्तव ने कहा कि यूरोपीय संघ ने अभी तक उत्पादों का ब्योरा प्रकाशित नहीं किया है। लेकिन प्रस्ताव से पता चलता है कि इस कर का विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में विस्तार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘यूरोपीय संघ सीबीएएम का व्यापक विस्तार करने की योजना बना रहा है। इस कदम से यूरोप को भारत में विनिर्मित वस्तुओं निर्यात पर कार्बन कर की लागत में भारी वृद्धि हो सकती है।’’
वर्तमान में, कार्बन कर लौह और इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन, बिजली और चुनिंदा इस्पात/एल्युमीनियम उत्पादों के आयात पर लागू होता है।
श्रीवास्तव ने आगाह किया कि जनवरी 2028 से, इंजीनियरिंग सामान, वाहन कल-पुर्जे, गढ़े हुए धातु उत्पाद, मशीनरी, एल्युमीनियम निर्मित वस्तुएं और अन्य औद्योगिक सामान निर्यात करने वाले भारतीय निर्यातकों को यूरोप को निर्यात करते समय कार्बन कर का सामना करना पड़ सकता है।
भाषा रमण पाण्डेय
पाण्डेय

Facebook


