भारत 6.8 से 7.2 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला देश बना रहेगा: समीक्षा

भारत 6.8 से 7.2 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला देश बना रहेगा: समीक्षा

भारत 6.8 से 7.2 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला देश बना रहेगा: समीक्षा
Modified Date: January 29, 2026 / 06:22 pm IST
Published Date: January 29, 2026 6:22 pm IST

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) देश की आर्थिक वृद्धि दर अगले वित्त वर्ष में 6.8 से 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इससे साफ है कि व्यापार जोखिम और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया।

हालांकि, अप्रैल से शुरू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यह अनुमान मौजूदा वित्त वर्ष के 7.4 प्रतिशत के अनुमान से कम है। इसका मुख्य कारण उपभोग और निवेश में कमी है।

देश की आर्थिक स्थिति को बयां करने वाली 2025-26 की समीक्षा में कहा गया, ‘‘हाल के वर्षों में नीतिगत सुधारों के प्रभाव से अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की वृद्धि क्षमता 6.5 से 6.8 प्रतिशत से बढ़कर सात प्रतिशत के करीब पहुंच गई है।’’

‘‘यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितता के बीच मजबूत वृद्धि का दृष्टिकोण बना हुआ है और इसके लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है, लेकिन निराशावादी होने की जरूरत नहीं है।’’

चालू वर्ष के लिए 7.4 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान पिछले वर्ष की समीक्षा में अनुमानित 6.3 से 6.8 प्रतिशत की तुलना में अधिक है। लेकिन अगले वर्ष के लिए अनुमान से साफ है कि अमेरिका के साथ व्यापार तनाव के बावजूद भारत दुनिया में सबसे तेज आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने वाला देश बना रहेगा।

भारत उन कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिसने अभी तक अमेरिका के साथ व्यापार समझौता नहीं किया है। अमेरिका ने भारत से निर्यात होने वाले सामान पर 50 प्रतिशत का उच्चतम शुल्क लगाया है।

श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले शुल्क के जवाब में, नरेन्द्र मोदी सरकार ने नीति और कर सुधारों की शुरुआत की है। इनमें जीएसटी दरों में कटौती, आयकर सीमा को बढ़ाना, कंपनियों पर अनुपालन बोझ कम करने के लिए श्रम कानूनों में संशोधन और मई, 2025 के बाद से चार मुक्त व्यापार समझौते शामिल हैं। इनमें यूरोपीय संघ के साथ एक बड़ा समझौता भी शामिल है।

हालांकि महंगाई कम है, कंपनियों और परिवारों की बही-खाते बेहतर है और उपभोग मांग मजबूत बनी हुई है, पर अमेरिकी शुल्क के कारण रुपये में पिछले साल लगभग पांच प्रतिशत की गिरावट आई है और अब यह अपनी क्षमता से निचले स्तर पर है।

समीक्षा में कहा गया, ‘‘रुपये का मूल्यांकन भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद को सही रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता है। हालांकि, रुपये के मूल्य में गिरावट ‘भारतीय वस्तुओं पर उच्च अमेरिकी शुल्क के प्रभाव को कुछ हद तक कम करती है।’

हालांकि, इसमें कहा गया है कि वृहद आर्थिक परिस्थितियां ‘बाह्य झटकों’ के प्रति मजबूती प्रदान करती हैं और वृद्धि की गति को बनाए रखने में सहायक हैं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि यदि उच्च शुल्क लागू रहता हैं तो आगामी वित्त वर्ष में 6.2 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा तैयार आर्थिक समीक्षा में कहा गया, ‘‘अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता इस वर्ष समाप्त होने की उम्मीद है। इससे बाहरी मोर्चे पर अनिश्चितता कम करने में मदद मिल सकती है।’’

समीक्षा में वैश्विक व्यापार और अन्य चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाए गए उपायों में से एक ‘स्वदेशी’ है, जिसे अनुशासित रणनीति के रूप में लागू करने की बात कही गयी है।

इसमें कहा गया है कि हालांकि सभी आयात प्रतिस्थापन न तो व्यावहारिक हैं और न ही वांछनीय, लेकिन विकसित देशों द्वारा निर्यात नियंत्रण और प्रौद्योगिकी पर पाबंदियों के मद्देनजर स्वदेशी अपरिहार्य और आवश्यक है।

समीक्षा में ‘कच्चे माल की लागत में कमी के लिए राष्ट्रीय रणनीति’ का आह्वान किया गया है।

राजस्व के दृष्टिकोण से, चालू वित्त वर्ष 2025-26 में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर संग्रह दोनों ही मजबूत बने हुए हैं। विशेष रूप से गैर-कंपनी कर संग्रह (जिसमें व्यक्तिगत कर संग्रह शामिल है) की वृद्धि अन्य करों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से तेजी से हो रही है। यह स्पष्ट रूप से कर संग्रह के विभिन्न श्रेणियों, प्रशासनिक सुधारों और यहां तक ​​कि भविष्य के कर सुधारों की सफलता को बताता है।

समीक्षा में नए आयकर कानून के महत्व के बारे में भी बताया गया है, जो एक अप्रैल से प्रभावी होने वाला है। इसका उद्देश्य करदाताओं के लिए सरलता और संरचनात्मक स्पष्टता प्रदान करना तथा स्वैच्छिक अनुपालन को प्रोत्साहित करना है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक फरवरी को 2026-27 का बजट पेश करने से पहले जारी समीक्षा में विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में देश की निर्यात नीतियों में कमियों को उजागर किया गया है।

समीक्षा में कहा गया है कि मूल्य के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश चार वर्षों के भीतर कृषि, समुद्री और खाद्य एवं पेय पदार्थों के निर्यात में 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है।

साथ ही, इसमें चेतावनी दी गई है कि बार-बार नीतिगत बदलावों से आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान उत्पन्न होने, अनिश्चितता बढ़ने और विदेशी खरीदारों को वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाने का खतरा है। इससे खोए हुए निर्यात बाजारों को फिर से प्राप्त करना मुश्किल होगा।

इसमें पूंजी की लागत को कम करने और बैंकों के अलावा वित्तपोषण के स्रोतों में विविधता लाने के लिए कई कदम उठाने का भी आह्वान किया गया है। इसमें अन्य कदमों के साथ-साथ ऋण उत्पादों पर कर कम करने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में ‘डिजिटल लत’ से निपटने के लिए सोशल मीडिया ऐप तक पहुंच पर आयु-आधारित सीमाएं निर्धारित करने का आह्वान किया गया है। साथ ही, कोविड-19 के दौरान विस्तारित ऑनलाइन शिक्षण उपकरणों पर निर्भरता को कम करने और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात कही गई है।

इसमें बच्चों के लिए बेसिक फोन या ऑनलाइन सामग्रियों के नियमन के साथ केवल पठन-पाठन के लिए टैब जैसे उपकरणों को बढ़ावा देने का सुझाव भी दिया गया।

समीक्षा में सभी मीडिया मंचों सुबह छह बजे से रात 11 बजे तक अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (यूपीएफ) के विपणन पर प्रतिबंध लगाने और नवजात एवं छोटे बच्चों के दूध और पेय पदार्थों के विपणन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की गई।

समीक्षा में स्विगी, जोमैटो जैसी कंपनियों में काम करने वाले अस्थायी कामगारों (गिग) के लिए काम की शर्तों को नया रूप देने वाली नीति का समर्थन किया गया है। साथ ही गोपनीय रिपोर्ट को छूट देने के लिए आरटीआई अधिनियम में संशोधन की भी बात कही गयी है।

भाषा रमण अजय

अजय


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