पासा पलटने वाला साबित हुई है दिवाला संहिता, दिवाला प्रक्रिया में आया आमूलचूल बदलावः नागराजू
पासा पलटने वाला साबित हुई है दिवाला संहिता, दिवाला प्रक्रिया में आया आमूलचूल बदलावः नागराजू
नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) वित्तीय सेवा सचिव एम नागराजू ने बुधवार को कहा कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) एक पासा पलटने वाला साबित हुई है और इसने पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता को बढ़ावा देकर कंपनियों की दिवाला समाधान प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव किया है।
नागराजू ने भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) और इनसॉल इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आईबीसी से देश की अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने की नींव पड़ी है।
नागराजू ने कहा, ‘इन उपलब्धियों के बावजूद आईबीसी के समक्ष कुछ अहम चुनौतियां अभी बरकरार हैं। इनमें कर्ज समाधान और परिसमापन में लगने वाला समय, इससे परिसंपत्तियों के मूल्य में होने वाले नुकसान, लेनदारों को कम वसूली और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की क्षमता संबंधी सीमाएं शामिल हैं।’
उन्होंने कहा कि संसद की प्रवर समिति की सिफारिशों पर लाया गया आईबीसी संशोधन विधेयक, 2025 इन प्रमुख चुनौतियों से निपटने का प्रयास करता है। यह विधेयक समाधान एवं परिसमापन में हो रही देरी और कम वसूली दर जैसी समस्याओं को दूर करने पर केंद्रित है।
नागराजू के मुताबिक, संशोधन विधेयक में समूह दिवाला प्रक्रिया, सीमा-पार दिवाला और लेनदार-प्रेरित दिवाला प्रक्रियाओं से जुड़े प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं, ताकि आईबीसी के ढांचे को अधिक मजबूत एवं विस्तृत किया जा सके।
उन्होंने उम्मीद जताई कि इन सुधारों से दिवाला मामलों के निपटान की समयसीमा और प्रभावशीलता में सुधार होगा, निवेशकों और लेनदारों का भरोसा बढ़ेगा और भारत की दिवाला व्यवस्था वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अधिक अनुरूप होगी।
आईबीसी को 2016 में लागू किए जाने के बाद त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के लिए अब तक इसमें छह संशोधन किए जा चुके हैं।
उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और आईबीबीआई के प्रयासों के अलावा वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) भी दिवाला प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए कई कदम उठा रहा है। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े खातों की नियमित समीक्षा, आईबीबीआई के साथ सक्रिय समन्वय और बैंकों को सामान्य परामर्श जारी करना शामिल है।
नागराजू ने कहा कि आईबीसी सरकार के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। सितंबर 2025 तक 1,300 कॉरपोरेट कर्जदारों के मामलों में समाधान योजनाएं मंजूर की गईं, जिससे लेनदारों को लगभग चार लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई। इससे अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) अनुपात घटकर 2.05 प्रतिशत और शुद्ध एनपीए 0.52 प्रतिशत रह गया।
उन्होंने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2023-24 में 1.41 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया था जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया।
नागराजू ने कहा कि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू होने पर कंपनी का नियंत्रण खोने का डर देनदारों को जल्द बकाया चुकाने के लिए प्रेरित कर रहा है। मार्च 2025 तक सीआईआरपी शुरू करने से जुड़े 30,310 आवेदन एनसीएलटी में जाने से पहले ही सुलझा लिए गए थे।
भाषा प्रेम
प्रेम रमण
रमण


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