एनसीएलटी में नियुक्तियों व बुनियादी ढांचे से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई टली

एनसीएलटी में नियुक्तियों व बुनियादी ढांचे से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई टली

एनसीएलटी में नियुक्तियों व बुनियादी ढांचे से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई टली
Modified Date: July 14, 2026 / 12:35 pm IST
Published Date: July 14, 2026 12:35 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 14 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में सदस्यों की नियुक्ति में देरी और बुनियादी ढांचे से जुड़े मामले की सुनवाई यह कहते हुए स्थगित कर दी कि नियुक्ति प्रक्रिया फिलहाल जारी है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एनसीएलटी में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति में देरी तथा उसके बुनियादी ढांचे की कमियों से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई सोमवार को स्थगित कर दी।

सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता ने पीठ का ध्यान इस ओर दिलाया कि स्वत: संज्ञान की कार्यवाही केवल एनसीएलटी में रिक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अपर्याप्त बुनियादी ढांचे तथा न्यायाधिकरण में मामलों के निपटान की दर से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।

इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ मेरे साथियों (दूसरी पीठ के न्यायाधीशों) ने सही मुद्दा उठाया है। यह चिंता का गंभीर विषय है।’’

‘राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और उससे जुड़े अन्य मुद्दे’ शीर्षक से स्वत: संज्ञान की यह कार्यवाही 19 मई को दर्ज की गई थी। यह कार्रवाई 29 अप्रैल को एवीजे हाइट्स अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन बनाम आईआईएफएल फाइनेंस लिमिटेड मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद शुरू हुई।

उस फैसले में न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान योजनाओं को मंजूरी देने में लगातार हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।

पीठ ने इसे ‘‘गंभीर स्थिति’’ बताते हुए स्वत: संज्ञान लिया और उचित निर्देशों के लिए मामले को प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया, जिसके बाद वर्तमान कार्यवाही दर्ज की गई।

इस 29 अप्रैल के फैसले में कहा गया था कि समाधान योजनाओं को मंजूरी देने से संबंधित 383 आवेदन एनसीएलटी के समक्ष लंबित थे। इनमें देरी 48 दिन से लेकर 738 दिन तक थी और कुछ मामलों में यह लगभग चार वर्ष तक पहुंच गई थी।

पीठ ने कहा था कि इतनी देरी आईबीसी के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है, क्योंकि इससे समयबद्ध दिवाला समाधान सुनिश्चित करने, परिसंपत्तियों के मूल्य को बनाए रखने और आर्थिक दक्षता को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्रभावित होता है।

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा


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