एनसीएलटी ने बीपीएल के खिलाफ मॉर्गन सिक्योरिटीज की 1,323 करोड़ रुपये की दिवाला याचिका खारिज की

एनसीएलटी ने बीपीएल के खिलाफ मॉर्गन सिक्योरिटीज की 1,323 करोड़ रुपये की दिवाला याचिका खारिज की

एनसीएलटी ने बीपीएल के खिलाफ मॉर्गन सिक्योरिटीज की 1,323 करोड़ रुपये की दिवाला याचिका खारिज की
Modified Date: July 8, 2026 / 07:59 pm IST
Published Date: July 8, 2026 7:59 pm IST

नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने मॉर्गन सिक्योरिटीज एंड क्रेडिट्स प्राइवेट लिमिटेड (एमएससीपीएल) की बीपीएल के खिलाफ दायर दिवाला याचिका खारिज कर दी है।

न्यायाधिकरण ने कहा कि 1,323.70 करोड़ रुपये की चूक (डिफॉल्ट) का दावा एक समयसीमा के भीतर करना था और यह दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) का इस्तेमाल कर्ज वसूली के साधन के रूप में करने के समान है।

एनसीएलटी की कोच्चि पीठ ने कहा कि यह याचिका मध्यस्थता प्रक्रिया, अपीलीय उपायों और वसूली कार्यवाही पहले ही शुरू करने के बाद आईबीसी के जरिये राशि वसूलने का प्रयास है।

एनसीएलटी ने सात जुलाई के अपने आदेश में कहा, ‘मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधिकरण का मत है कि वर्तमान कार्यवाही मूल रूप से कई वर्षों तक मध्यस्थता, अपीलीय कार्यवाही और वसूली उपाय अपनाने के बाद पंचाट आदेश (अवार्ड) के तहत दावा की गई शेष राशि की वसूली का प्रयास है। इस तरह दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल संहिता के उद्देश्य और प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।’

एनसीएलटी का यह फैसला एमएससीपीएल द्वारा दायर धारा सात के आवेदन पर आया है।

मॉर्गन सिक्योरिटीज ने उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वास्थ्य सेवा उपकरण बनाने वाली कंपनी बीपीएल के खिलाफ वर्ष 2002-03 के ‘बिल डिस्काउंटिंग’ के लेन-देन से जुड़े 1,323.70 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय ऋण के कारण कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू करने की अपील की थी। बिल डिस्काउंटिंग एक अल्पकालिक वित्तीय प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से विक्रेता अपने बकाया इनवॉइस को बैंक या वित्तीय संस्थान को बेचकर तुरंत नकदी प्राप्त कर सकता है।

मॉर्गन सिक्योरिटीज का तर्क था कि बीपीएल ने 2002 और 2003 में दी गई बिल डिस्काउंटिंग की सुविधाओं के तहत पुनर्भुगतान दायित्वों में चूक की थी।

कंपनी के अनुसार, यह देनदारी दिसंबर, 2016 में पारित एक मध्यस्थता आदेश के माध्यम से तय हुई थी, जिसे बाद में दिसंबर, 2025 में उच्चतम न्यायालय ने भी बरकरार रखा था।

लेनदार का दावा था कि वसूलियों और अदालत के निर्देश पर किए गए भुगतानों के बावजूद, 1,323 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बकाया है।

हालांकि, बीपीएल ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि मूल चूक जून, 2007 की थी और मार्च, 2026 में दायर की गई दिवाला याचिका समय-बाधित थी। कंपनी ने यह भी प्रस्तुत किया कि पर्याप्त भुगतान पहले ही किया जा चुका है और यह दावा काफी हद तक मूल बकाया के बजाय ब्याज से संबंधित है।

भाषा योगेश अजय

अजय


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