‘उद्योग’ की परिभाषा पर 17 मार्च को सुनवाई करेगी उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ

'उद्योग' की परिभाषा पर 17 मार्च को सुनवाई करेगी उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ

‘उद्योग’ की परिभाषा पर 17 मार्च को सुनवाई करेगी उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ
Modified Date: March 14, 2026 / 01:23 pm IST
Published Date: March 14, 2026 1:23 pm IST

नयी दिल्ली, 14 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ 17 मार्च से औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा के विवादास्पद मुद्दे पर सुनवाई शुरू करने वाली है।

न्यायालय की 17 मार्च की कार्यसूची के अनुसार, इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ करेगी। इस पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल हैं।

इससे पहले 16 फरवरी को न्यायालय ने उन व्यापक मुद्दों को तैयार किया था, जिन पर इस पीठ को निर्णय लेना है।

देश की सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना है कि क्या 1978 के बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड मामले में न्यायमूर्ति वी आर कृष्णा अय्यर द्वारा ‘उद्योग’ को परिभाषित करने के लिए तय किए गए मानक सही हैं? साथ ही, पीठ यह भी देखेगी कि औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 और औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (जो 21 नवंबर, 2025 से प्रभावी है) का मूल अधिनियम में ‘उद्योग’ शब्द की व्याख्या पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है।

पीठ द्वारा तय किए गए मुख्य मुद्दों में से एक यह है कि क्या सरकारी विभागों द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक कल्याण कार्यों, योजनाओं या अन्य उद्यमों को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) के तहत ”औद्योगिक गतिविधियां” माना जा सकता है।

अदालत ने संबंधित पक्षों को 28 फरवरी तक अपनी लिखित दलीलें देने का मौका दिया था। नौ न्यायाधीशों की यह पीठ 17 मार्च को सुनवाई शुरू करेगी और इसे 18 मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

उल्लेखनीय है कि 2017 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की पीठ ने इस मुद्दे के गंभीर और व्यापक प्रभावों को देखते हुए इसे नौ न्यायाधीशों की पीठ को भेजने का निर्णय लिया था। इससे पहले मई 2005 में भी एक पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।

यह कानूनी विवाद दशकों पुराना है। वर्ष 1996 में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सामाजिक वानिकी विभाग को ‘उद्योग’ माना था, लेकिन 2001 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने अलग राय व्यक्त की, जिसके बाद मामला बड़ी पीठों के पास पहुंचता गया।

भाषा पाण्डेय

पाण्डेय


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