स्वदेशी को आगे बढ़ाना अपरिहार्य, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध वैश्वीकरण के अंत का संकेत:समीक्षा

स्वदेशी को आगे बढ़ाना अपरिहार्य, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध वैश्वीकरण के अंत का संकेत:समीक्षा

स्वदेशी को आगे बढ़ाना अपरिहार्य, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध वैश्वीकरण के अंत का संकेत:समीक्षा
Modified Date: January 29, 2026 / 05:29 pm IST
Published Date: January 29, 2026 5:29 pm IST

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) बढ़ते निर्यात नियंत्रण, विकसित देशों के प्रौद्योगिकी देने से इनकार और कार्बन कर व्यवस्था वास्तव में वैश्वीकरण के अंत का संकेत दे रहे हैं। ऐसे में भारत में स्वदेशी नीतियों पर ध्यान देना अपरिहार्य और आवश्यक है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया।

वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत को आयात प्रतिस्थापन, रणनीतिक मजबूती और रणनीतिक अनिवार्यता की अपनी निकट, मध्यम और दीर्घकालिक नीतिगत प्राथमिकताओं को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

समीक्षा के अनुसार, ‘‘समय बर्बाद करने का कोई समय नहीं है। यह एक ही समय में मैराथन और तेजी से दौड़ने जैसा है या मैराथन को ‘स्प्रिंट’ (तेजी से दौड़ना) की तरह दौड़ना है।’’

इसमें कहा गया है कि वर्तमान में कोई भी देश ऐसे वातावरण में काम कर रहा है जहां कच्चा माल, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक पहुंच को निर्बाध या स्थायी नहीं माना जा सकता है।

निर्यात नियंत्रण, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध, कार्बन सीमा तंत्र और पश्चिम एवं पूर्व दोनों देशों की औद्योगिक नीतियां सीधे तौर पर वैश्वीकरण की समाप्ति का संकेत है।

इसमें कहा गया, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में स्वदेशी एक रक्षात्मक और आक्रामक नीतिगत साधन बन जाता है।’’ यह बाहरी झटकों के बावजूद उत्पादन की निरंतरता सुनिश्चित करने का एक माध्यम है और आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ करने वाली स्थायी राष्ट्रीय क्षमताओं के निर्माण का रास्ता साफ करता है।’’

सवाल अब यह नहीं है कि राज्य को स्वदेशी को प्रोत्साहित करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि दक्षता, नवाचार या वैश्विक एकीकरण को कमजोर किए बिना ऐसा कैसे किया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बार-बार लोगों और उद्योगों दोनों से स्वदेशी (स्थानीय स्तर पर विनिर्मित) उत्पादों को अपनाने का आह्वान किया है।

सरकार ने चीन जैसे देशों पर आयात निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने को लेकर कई उपाय किए हैं।

समीक्षा में कहा गया है कि आयात प्रतिस्थापन के सभी तरीके वांछनीय नहीं हैं और संरक्षण के सभी रूप दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धी क्षमता का समर्थन नहीं करते हैं।

समीक्षा में कहा गया, ‘‘स्वदेशी एक अनुशासित रणनीति है, न कि कोई सर्वव्यापी सिद्धांत।’’ स्थायी संरक्षण उन क्षेत्रों में सही नहीं है जहां भारत पहले से ही लागत-प्रतिस्पर्धी है, जहां बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा रहा है, जहां उत्पाद आपूर्ति श्रृंखलाओं में मध्यवर्ती के रूप में कार्य करते हैं, या जहां श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए कच्चा माल महत्वपूर्ण हैं।

इसने ऐसे संरक्षण के प्रति आगाह किया जो निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादकों को संरक्षण देता है, उलट शुल्क ढांचे के माध्यम से मौजूदा स्थिति को मजबूत करता है या समर्थन और नवाचार, सीखने और वैश्विक एकीकरण के बीच संबंध को तोड़ता है।

समीक्षा में कहा गया, ‘‘स्वदेशीकरण के लिए एक अनुशासित दृष्टिकोण को लेकर यह स्पष्टता आवश्यक है कि हस्तक्षेप कब दीर्घकालिक क्षमता का निर्माण करता है और कब यह केवल अक्षमता को बनाए रखता है।’’

भाषा रमण अजय

अजय


लेखक के बारे में