लंबी अवधि के वायदा, विकल्प उत्पादों पर मार्जिन तर्कसंगत बनाने पर हो रहा विचार: सेबी चेयरमैन
लंबी अवधि के वायदा, विकल्प उत्पादों पर मार्जिन तर्कसंगत बनाने पर हो रहा विचार: सेबी चेयरमैन
मुंबई, 23 सितंबर (भाषा) सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने बुधवार को कहा कि लंबी अवधि के वायदा एवं विकल्प (डेरिवेटिव) उत्पादों के लिए मार्जिन की जरूरतों को तर्कसंगत बनाने और संभावित रूप से कम करने पर विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वायदा एवं विकल्प (एफएंडओ) खंड में अधिक स्वस्थ और दीर्घकालिक भागीदारी को बढ़ावा देना है।
पांडेय ने यहां 13वें एसबीआई बैंकिंग एवं अर्थशास्त्र सम्मेलन के दौरान अलग से बातचीत में कहा, ‘‘सेबी लंबी अवधि वाले डेरिवेटिव उत्पादों पर मार्जिन की जरूरतों की समीक्षा करने और संभावित रूप से इसे कम करने के लिए खुले मन से विचार को तैयार है, ताकि वायदा एवं विकल्प बाजार में अधिक स्वस्थ, दीर्घकालिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके।’’
डेरिवेटिव में मार्जिन से आशय उस जमानत राशि या सुरक्षा जमा से है, जिसे किसी कारोबारी को वायदा और विकल्प जैसे डेरिवेटिव अनुबंधों में सौदा करने और उसे बनाए रखने के लिए जमा रखना होता है। यह सुनिश्चित करता है कि संबंधित पक्ष अपने वित्तीय दायित्वों को पूरा करने में सक्षम हों और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भुगतान में चूक के जोखिम से बचाव हो।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) प्रमुख ने कहा कि नियामक लंबी अवधि के अनुबंधों के लिए मार्जिन में संभावित बदलाव समेत संरचनात्मक उपायों की भी जांच कर रहा है।
पांडेय ने कहा कि नियामक का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित है कि निवेशकों की सुरक्षा और बाजार में भरोसा बनाए रखते हुए उन तक पहुंच आसान हो।
उन्होंने बाद में सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘कारोबार सुगमता और निवेशक संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी उद्देश्य नहीं हैं।’’
पांडेय ने कहा, ‘‘उचित नियमन अनावश्यक अड़चनों को कम कर सकता है। इसलिए हमारा उद्देश्य बाजार तक पहुंच आसान बनाना है। साथ ही उस भरोसे को बनाए रखना है जिस पर ये बाजार टिके हैं।’’
उन्होंने यह बात ऐसे समय कही है जब नियामक शेयर डेरिवेटिव खंड में खुदरा निवेशकों के सामने आने वाले जोखिमों पर ध्यान दे रहा है। इस खंड में बहुत तेजी से होने वाला कारोबार और उधार के सहारे लिए गए सौदे भारी नुकसान का कारण बन सकते हैं।
सेबी प्रमुख ने कहा कि भारत के वित्तीय बाजारों का काफी विस्तार हुआ है, लेकिन अगले चरण को केवल बाजार के आकार से नहीं मापा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या हमारे बाजार अधिक मजबूत और अधिक नकदी वाले हो रहे हैं? क्या हम दीर्घकालिक पूंजी के पर्याप्त स्रोत तैयार कर रहे हैं?’’
पांडेय ने नए निवेशकों के बाजार में आने और उनके लिए नए उत्पाद उपलब्ध होने के बीच सोच-समझकर निवेश करने की जरूरत पर जोर दिया।’’
सेबी चेयरमैन ने यह भी कहा कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को अलग-अलग उद्देश्यों और विभिन्न अवधि के लिए अलग-अलग तरह की पूंजी की जरूरत है। बैंकों और पूंजी बाजारों को एक ही वित्तपोषण व्यवस्था के पूरक हिस्सों के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि के अगले चरण में प्रवेश के साथ भारतीय वित्तीय बाजारों को ‘अधिक मजबूत, विविधतापूर्ण, दक्ष और भरोसेमंद’ बनने की जरूरत है।
भाषा रमण अजय
अजय

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