आरबीआई के उपाय 70 अरब डॉलर तक विदेशी पूंजी कर सकते हैं आकर्षित: इंडिया रेटिंग्स
आरबीआई के उपाय 70 अरब डॉलर तक विदेशी पूंजी कर सकते हैं आकर्षित: इंडिया रेटिंग्स
नयी दिल्ली, 10 जून (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक के एफसीएनआर (बी) जमा एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बाह्य यानी विदेशी वाणिज्यिक उधारी से जुड़े विदेशी मुद्रा अदला-बदली उपायों से 60 से 70 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी आकर्षित हो सकती है, जिससे रुपये को समर्थन मिलेगा। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने बुधवार को यह कहा।
केंद्रीय बैंक ने आठ जून को घोषणा की थी कि अधिकृत डीलर बैंक तीन से पांच वर्ष की परिपक्वता वाले विदेशी मुद्रा प्रवासी (बैंक) (एफसीएनआर बी) जमा के लिए 30 सितंबर तक आरबीआई की अदला-बदली सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। यह सुविधा बैंकों को अमेरिकी डॉलर जमा को नियामक के साथ अदला-बदली करने तथा मुद्रा जोखिम प्रबंधन में मदद करेगी।
आरबीआई के विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाने के लिए घोषित उपायों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को 30 सितंबर तक ईसीबी जुटाने के लिए रियायती मुद्रा अदला-बदली सुविधा भी शामिल है।
इंडिया रेटिंग्स ने कहा कि एफसीएनआर (बी) विदेशी पूंजी जुटाने में अहम भूमिका निभाएगा जिसमें हेजिंग यानी जोखिम बचाव से जुड़े लागत का भार आरबीआई उठाएगा और बैंक विदेशी जमाकर्ताओं को बेहतर रिटर्न दे सकेंगे।
रेटिंग एजेंसी ने बयान में कहा, ‘‘ इंडिया रेटिंग्स को उम्मीद है कि यह व्यवस्था बड़े पैमाने पर पूंजी प्रवाह उत्पन्न करेगी, जो 60 से 70 अरब डॉलर के दायरे में हो सकता है। इससे रुपये को महत्वपूर्ण सहारा मिलेगा और वित्तीय प्रणाली में व्यापक वित्त पोषण दबाव कम होगा।’’
मजबूत पूंजी प्रवाह की इस पृष्ठभूमि में मुद्रा पहले 95 रुपये प्रति डॉलर से नीचे आकर 90 रुपये के करीब पहुंच सकती है। वित्त वर्ष 2026-27 में यह औसतन लगभग 93.10 रुपये के स्तर पर रह सकती है। मुद्रा की दिशा मुद्रास्फीति, ब्याज दरों और पूंजी प्रवाह के रुझान पर निर्भर करेगी।
इंडिया रेटिंग्स ने कहा कि एफसीएनआर (बी) जमा और ईसीबी की सफलता निकट अवधि में रुपये की चाल के लिए महत्वपूर्ण होगी।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने ऊर्जा कीमतों को बढ़ाया है जिससे व्यापार घाटा बढ़ा और रुपये पर दबाव पड़ा है। बड़े पूंजी निकासी ने भी मुद्रा को कमजोर किया है।
नीति निर्माताओं ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए उपाय किए हैं। इनका उद्देश्य केवल रुपये को स्थिर करना ही नहीं बल्कि बाहरी संतुलन सुधारना और वैश्विक बाजार एकीकरण को बढ़ाना भी है।
आरबीआई के अलावा, सरकार ने आठ जून को सरकारी प्रतिभूति बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई सुधार लागू किए।
इनमें ब्याज आय, दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) और अल्पकालिक पूंजीगत लाभ (एसटीसीजी) पर कर छूट, पूरी तरह सुलभ मार्ग (एफएआर) के तहत प्रतिभूतियों का विस्तार और निवेश मानकों को सरल बनाना शामिल है।
इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र कुमार पंत ने कहा, ‘‘ सरकार और आरबीआई के समन्वित उपाय एक ‘बफर’ प्रदान करते हैं, लेकिन अनिश्चित वैश्विक माहौल और कमजोर निर्यात के कारण जोखिम बने हुए हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ हालांकि यह अल्पकाल में राहत दे सकता है, लेकिन मध्यम से दीर्घ अवधि में मजबूत पूंजी प्रवाह टिकाऊ राहत प्रदान कर सकते हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव मुद्राओं को प्रभावित कर सकता है, जबकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका वृद्धि पर दबाव डाल सकती है।’’
भाषा निहारिका रमण
रमण

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