मध्यम अवधि में रुपये पर लगातार दबाव बने रहने की संभावना नहींः सीईए
मध्यम अवधि में रुपये पर लगातार दबाव बने रहने की संभावना नहींः सीईए
मुंबई, 24 सितंबर (भाषा) मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने बृहस्पतिवार को कहा कि आने वाले वर्षों में रुपये पर लगातार दबाव बने रहने की संभावना नहीं है और भारत का लक्ष्य अलग-थलग ढंग से आत्मनिर्भरता हासिल करने के बजाय आर्थिक मजबूती बढ़ाना होना चाहिए।
नागेश्वरन ने ’13वें एसबीआई बैंकिंग एवं अर्थशास्त्र सम्मेलन’ में कहा कि रुपये की प्रतिस्पर्धी ‘वास्तविक प्रभावी विनिमय दर’ (आरईईआर) ने पिछले डेढ़-दो वर्षों में शुद्ध निर्यात वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत के व्यापार समझौते निर्यात को गति देने के साथ निर्यात आधारित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर मैं सिंगापुर में बैठा कोई निवेशक होता और मध्यम अवधि का नजरिया रखता, तो कृत्रिम मेधा (एआई) और ऊर्जा झटके जैसी निकट अवधि की चुनौतियों को लेकर चिंतित होने के बजाय रुपये के मौजूदा स्तर को लेकर काफी सहज होता।’’
विकसित देशों में हो रहे घटनाक्रमों को देखते हुए नागेश्वरन ने कहा कि मध्यम अवधि में रुपये पर लगातार गिरावट का दबाव बने रहने की उन्हें उम्मीद नहीं है।
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, खासकर स्मार्टफोन क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के चीन से हटने का देश को लाभ मिला है। स्मार्टफोन क्षेत्र में अपनाए गए मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी दोहराया जा सकता है।
नागेश्वरन ने कहा कि भारत को अपनी कमजोरियों वाले क्षेत्रों की पहचान कर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्षमता निर्माण पर संसाधन लगाने चाहिए। प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण क्षेत्र बनी रहेगी और भारत को लघु एवं मझोले उद्यमों तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के लिए महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ संबंधों में अनिश्चितता, ऊर्जा बाजार की स्थिति और विदेशों में निवेशकों के बीच एआई को लेकर जारी चर्चा में भारत की अपेक्षाकृत सीमित मौजूदगी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निकट अवधि की चुनौतियां हैं।
नागेश्वरन ने कहा कि निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को तेल सहित प्रमुख जिंसों के लिए पर्याप्त भंडार तैयार करने की जरूरत है। आदर्श रूप से कम-से-कम छह महीने का भंडार होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आयात और प्रमुख जिंसों पर निर्भरता बढ़ने के साथ वैश्विक पूंजी के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी और विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरें इस दबाव को बढ़ा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस साल उठाए गए कदम दूरदर्शिता को दर्शाते हैं।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
अजय

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