नयी दिल्ली, 10 जून (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से श्रमिकों पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर विदेशों में रोजगार के अवसरों, विदेश में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) पर पड़ रहा है।
जिनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) के 114वें सत्र को संबोधित करते हुए बीएमएस के श्रमिक प्रतिनिधि बोजी सुरेंद्रन ने कहा कि संघर्ष और अस्थिरता के इस दौर में श्रमिक संगठनों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि श्रमिक संगठनों को शांतिपूर्ण संवाद, नीतिगत हस्तक्षेप और स्थायी समाधान खोजने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
सुरेंद्रन ने कहा कि कृत्रिम मेधा (एआई) और नई प्रौद्योगिकी का उद्देश्य मानव की जगह लेने की नहीं, बल्कि उनकी सहायता करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक श्रमिक को सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक न्याय मिलना चाहिए।
उन्होंने तेजी से बढ़ रही मंच (जोमैटो, अमेजन आदि) और गिग अर्थव्यवस्था में कार्यरत श्रमिकों को भी उचित सम्मान, गरिमा और समान देने की आवश्यकता बताई। साथ ही केंद्र और कुछ राज्य सरकारों द्वारा ऑनलाइन मंचों के लिए काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों (गिग) को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के प्रयासों का स्वागत करते हुए इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था में समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
बीएमएस नेता ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ. हुंगबो के इस कथन का उल्लेख किया कि ‘‘श्रम कोई वस्तु नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि श्रम को ‘मानव पूंजी’ के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने ‘लेबर मार्केट’ शब्द के उपयोग की आलोचना करते हुए कहा कि यह अवधारणा श्रमिकों से जुड़ी कई समस्याओं, विशेषकर ‘हायर एंड फायर’ जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है।
भाषा अजय अजय रमण
रमण