चार दशक बाद छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह का अंत, बस्तर क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त घोषित

चार दशक बाद छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह का अंत, बस्तर क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त घोषित

चार दशक बाद छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह का अंत, बस्तर क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त घोषित
Modified Date: March 31, 2026 / 08:55 pm IST
Published Date: March 31, 2026 8:55 pm IST

रायपुर, 31 मार्च (भाषा) चार दशक से अधिक समय बाद छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादी सशस्त्र आंदोलन का अंत हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा तय समयसीमा के तहत मंगलवार को इस क्षेत्र को वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से मुक्त घोषित कर दिया गया।

दरअसल, 1980 के दशक में माओवादी पड़ोसी आंध्र प्रदेश में पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते दंडकारण्य के जंगलों, विशेषकर बस्तर में पहुंचे थे, जहां उन्होंने इसे अपने ठिकाने के रूप में विकसित करने की कोशिश की। एक छोटे वैचारिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे सशस्त्र विद्रोह में तब्दील हो गया, लेकिन पिछले एक दशक में इसके प्रभाव में लगातार गिरावट आई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बस्तर में नक्सलवाद का इतिहास तीन चरणों में बांटा जा सकता है-1980 के दशक में प्रवेश और विस्तार, 2004 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के गठन के बाद 2014 तक उग्र चरम, और इसके बाद लगातार गिरावट का दौर।

बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) सुंदरराज पट्टलिंगम ने बताया कि शुरुआती दौर में माओवादियों ने भौगोलिक दुर्गमता, कमजोर प्रशासनिक पहुंच और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का फायदा उठाकर जंगलों में अपना नेटवर्क स्थापित किया।

उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में केंद्रित सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया तंत्र, सुरक्षा शिविरों के विस्तार, बेहतर कनेक्टिविटी और आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन से माओवादी तंत्र को काफी कमजोर किया गया है।

सुरक्षा विश्लेषक डॉ. गिरीशकांत पांडेय के अनुसार, बस्तर में नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1980 में हुई थी, जब कोंडापल्ली सीतारामैया ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वॉर ग्रुप की स्थापना की। हालांकि, नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई थी, लेकिन 1980 के दशक में यह बस्तर में तेजी से फैला।

शुरुआती वर्षों में छात्र संगठनों के माध्यम से युवाओं की भर्ती कर उन्हें जंगलों में भेजा गया। 1981 में सुकमा जिले के गोलापल्ली में पहला हमला दर्ज किया गया, जिसमें एक पुलिसकर्मी की हत्या की गई। इसके बाद 1990 के दशक में संगठन का विस्तार कई राज्यों में हुआ और 1993 में मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति ने नेतृत्व संभाला। वर्ष 2004 में भाकपा (माओवादी) के गठन के साथ आंदोलन और मजबूत हुआ।

इसके बाद 2004 से 2014 के बीच आंदोलन अपने चरम पर रहा, जिसमें सुरक्षा बलों और बुनियादी ढांचे पर कई बड़े हमले हुए। इस दौरान सलवा जुडूम जैसे स्थानीय विरोधी अभियान भी सामने आए, हालांकि इससे हिंसा और विस्थापन की समस्याएं भी बढ़ीं।

वर्ष 2014 के बाद से सुरक्षा अभियानों और विकास कार्यों के संयुक्त प्रयासों के चलते नक्सलवाद में गिरावट शुरू हुई। हाल के वर्षों में शीर्ष माओवादी नेताओं के मारे जाने, आत्मसमर्पण करने या गिरफ्तार होने से संगठन और कमजोर हुआ।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 से 2026 के बीच 500 माओवादी मारे गए, जो 2001 से 2023 के बीच मारे गए कुल 1,600 माओवादियों का 31 प्रतिशत है। बस्तर में 2001 से 2023 तक 329 सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए, जबकि 2024 के बाद से 103 नए शिविर जोड़े गए।

पट्टलिंगम ने कहा कि बस्तर अब लगभग पूरी तरह नक्सल मुक्त हो चुका है और अब सरकार का ध्यान विकास, प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने और आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों के पुनर्वास पर है।

भाषा

संजीव राजकुमार रवि कांत


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