हिमाचल: नैना देवी मंदिर न्यास ने लंगर के बचे हुए भोजन से बायोगैस बनाना शुरू किया

हिमाचल: नैना देवी मंदिर न्यास ने लंगर के बचे हुए भोजन से बायोगैस बनाना शुरू किया

हिमाचल: नैना देवी मंदिर न्यास ने लंगर के बचे हुए भोजन से बायोगैस बनाना शुरू किया
Modified Date: April 4, 2026 / 06:03 pm IST
Published Date: April 4, 2026 6:03 pm IST

बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश), चार अप्रैल (भाषा) हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित नैना देवी मंदिर न्यास सामुदायिक रसोई (लंगर) से बचने वाले प्रयुक्त और प्रयुक्त भोजन से बायोगैस उत्पादन करने वाला राज्य का पहला शक्तिपीठ बन गया है। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी।

इस मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। अधिकारियों ने कहा कि मंदिर में लंगर के चने वाले प्रयुक्त और प्रयुक्त भोजन से बायोगैस तैयार कर इसे लागू करने वाला यह राज्य का पहला धार्मिक संस्थान बन गया है।

श्री नैना देवी मंदिर न्यास के अध्यक्ष और स्थानीय उप-मंडलीय अधिकारी (एसडीएम) धर्मपाल चौधरी ने कहा कि निकट भविष्य में इस बायोगैस संयंत्र की क्षमता का और विस्तार किया जाएगा।

मंदिर न्यास ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं से युक्त एक आधुनिक, पूर्वनिर्मित बायोगैस संयंत्र स्थापित किया है, जो अब पूरी तरह से चालू है। इससे उत्पन्न गैस का उपयोग मंदिर की रसोई में प्रसाद और लंगर तैयार करने के लिए किया जा रहा है।

इस संयंत्र में 200 किलोग्राम जैविक कचरे के प्रसंस्करण की क्षमता है और शुरुआती चरण में प्रतिदिन करीब 20 किलोग्राम बायोगैस का उत्पादन हो रहा है। भविष्य में उत्पादन को इतना बढ़ाने की योजना है कि यह मंदिर में इस्तेमाल होने वाले वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों के बराबर हो सके।

अधिकारियों ने बताया कि यह परियोजना ‘ग्रीन ब्रिक इको सॉल्यूशंस’ की तकनीकी विशेषज्ञता से स्थापित की गई है। वर्तमान में मंदिर के लंगर में श्रद्धालुओं के लिए भोजन तैयार करने में प्रतिदिन पांच से आठ वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों की खपत होती है।

उन्होंने कहा कि बायोगैस उत्पादन शुरू होने से न केवल खर्च में कमी आएगी, बल्कि मंदिर परिसर में उत्पन्न कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण भी संभव होगा। इससे पहले इस जैविक कचरे का निस्तारण एक बड़ी चुनौती था।

भाषा प्रचेता माधव

माधव


लेखक के बारे में