एम्स-दिल्ली ने पहली बार ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ प्रक्रिया शुरू की, हरीश के लिए विशेष टीम बनाई गई

एम्स-दिल्ली ने पहली बार ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ प्रक्रिया शुरू की, हरीश के लिए विशेष टीम बनाई गई

एम्स-दिल्ली ने पहली बार ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ प्रक्रिया शुरू की, हरीश के लिए विशेष टीम बनाई गई
Modified Date: March 16, 2026 / 09:56 pm IST
Published Date: March 16, 2026 9:56 pm IST

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) एम्स-दिल्ली ने हरीश राणा को ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की अनुमति देने वाले उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए प्रोटोकॉल शुरू कर दिया है। संबंधित सूत्रों का कहना है कि इस प्रक्रिया में लगभग दो से तीन सप्ताह लगेंगे।

वर्ष 2013 से अचेत 31 वर्षीय हरीश को शनिवार को उनके गाजियाबाद स्थित घर से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. बीआर आंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल में प्रशामक देखभाल इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया।

इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए, भारत में पहली बार, एनेस्थीसिया एवं पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. सीमा मिश्रा की अध्यक्षता में एक विशेष चिकित्सा टीम का गठन किया गया है।

टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया एवं पैलिएटिव मेडिसिन और मनोचिकित्सा विभाग के डॉक्टर शामिल हैं।

उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में 11 मार्च को हरीश के लिए ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की अनुमति प्रदान कर दी थी, जो पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक के छात्र थे। वह 2013 में चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए थे और सिर पर गंभीर चोटें आई थीं।

वह तभी से अचेत अवस्था (कोमा) में हैं, जिन्हें कृत्रिम पोषण सहायता और कभी-कभी ऑक्सीजन सहायता दी जाती है।

शीर्ष अदालत ने एम्स-दिल्ली को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि जीवन सहायता इस तरह वापस ली जाए कि उनकी गरिमा बनी रहे।

एम्स-दिल्ली की ऑन्को-एनेस्थीसिया, दर्द एवं प्रशामक देखभाल विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्टर सुषमा भटनागर ने कहा, ‘‘इस प्रक्रिया में आम तौर पर दर्द से पर्याप्त राहत सुनिश्चित करते हुए धीरे-धीरे पोषण संबंधी सहायता को रोकना या वापस लेना शामिल होता है। रोगी को प्रशामक बेहोशी दी जाती है ताकि उसे परेशानी न हो। कृत्रिम पोषण, ऑक्सीजन और दवाएं जैसे जीवन सहायता उपाय धीरे-धीरे वापस ले लिए जाते हैं। इसका उद्देश्य मृत्यु को लंबा खींचना या जल्दी करना नहीं होता।’’

हरीश के मामले में, सूत्रों ने कहा कि पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में दो से तीन सप्ताह लग सकते हैं।

गाजियाबाद में राणा के घर के एक वीडियो में रिश्तेदार प्रार्थना करते दिखते हैं। ब्रह्मकुमारीज की एक सदस्य हरीश के माथे पर ‘तिलक’ लगाते और यह कहती दिखती हैं, ‘‘सबको माफ़ करते हुए, सबसे माफ़ी मांगते हुए, सो जाओ…ठीक है।’’

माउंट आबू आधारित ब्रह्मकुमारीज की सदस्य कोमल ने ‘पीटीआई-भाषा’ को फोन पर बताया कि भावुक कर देने वाले वीडियो में दिख रहीं ब्रह्मकुमारी गाजियाबाद के मोहन नगर सेवा केंद्र की सिस्टर लवली हैं।

उन्होंने कहा कि परिवार का आध्यात्मिक रूप से गहरा झुकाव रहा है, जिससे उन्हें हरीश की देखभाल की 13 साल की कठिन अवधि को सहन करने में मदद मिली।

कोमल ने कहा, ‘‘हालांकि दंपति का एक और बेटा है, लेकिन बढ़ती उम्र के कारण उन्हें यह चिंता सताने लगी थी कि जब वे ऐसा करने में सक्षम नहीं रहेंगे तो भविष्य में हरीश की देखभाल कौन करेगा।’’

हरीश के पिता अशोक राणा से टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं हो पाया।

कोमल के अनुसार, चिकित्सा परामर्श के साथ-साथ, परिवार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रक्रिया के लिए तैयारी करते हुए आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी मांगा।

चिकित्सा बोर्ड के इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद कि हरीश की स्थिति में अब सुधार नहीं हो पाएगा, शीर्ष अदालत ने जीवनरक्षक सहायता को वापस लेने की अनुमति दे दी।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले अशोक राणा ने फैसले के बाद कहा था कि यह निर्णय बेहद दर्दनाक है लेकिन जरूरी है।

उन्होंने कहा, ‘‘कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेगा। यह निर्णय उनके बेटे के सर्वोत्तम हित में लिया गया।’’

न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यह आदेश ‘सक्रिय इच्छामृत्यु’ की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि इसमें ‘फीडिंग ट्यूब’ को हटाना और प्रशामक देखभाल जारी रखना शामिल है ताकि मृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया गरिमा के साथ हो सके।

भाषा नेत्रपाल आशीष

आशीष


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