नयी दिल्ली, चार सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय से कहा गया है कि झारखंड की झामुमो सरकार द्वारा 30 दिसंबर, 2025 को तदाशा मिश्रा को उनके अवकाश ग्रहण करने से एक दिन पहले पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) नियुक्त करना न्यायालय के उस निर्देश का उल्लंघन था जिसके तहत पद संभालने के समय अधिकारी का कार्यकाल कम से कम छह महीना बाकी होना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता और न्याय मित्र राजू रामचंद्रन ने एक आदेश के तहत यह नोट दाखिल किया है। वह प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली एक पीठ की मदद कर रहे हैं जो डीजीपी की नियुक्ति की प्रक्रिया के बारे में न्यायालय के निर्देशों के विभिन्न राज्यों द्वारा कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
पीठ के सामने पेश किए गए नोट में रामचंद्रन ने कहा, ‘‘मौजूदा डीजीपी के अवकाशग्रहण करने से एक दिन पहले नियुक्ति, प्रकाश सिंह-1, 2 और 3 के फैसलों और आदेशों में तय सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन है।’’
इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। 18 अगस्त को, पीठ ने न्याय मित्र से झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की याचिका के जवाब में अपना नोट दाखिल करने को कहा था। मरांडी ने मांग की थी कि यह घोषित किया जाए कि डीजीपी की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित राज्य सरकार के संशोधित नियम, न्यायालय के फैसले का उल्लंघन करते हैं।
मरांडी की ओर से वकील अभिषेक राय और ज्ञानंत सिंह पेश हुए।
झारखंड कैडर की 1994 बैच की आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारी तदाशा मिश्रा को हेमंत सोरेन सरकार ने 30 दिसंबर, 2025 को – उनके अवकाशग्रहण करने से एक दिन पहले – राज्य की डीजीपी नियुक्त किया था।
न्याय मित्र ने अपने नोट में कहा कि हालांकि राज्य के विवादित नियमों के कई प्रावधान उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह फैसलों की भावना का उल्लंघन नहीं करते हैं, लेकिन कुछ प्रावधानों में मनमानी और राजनीतिक दखल को रोकने के लिए स्पष्टीकरण और सुरक्षा उपायों की जरूरत है।
प्रकाश सिंह मामले में आए अहम फैसलों के तहत, डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने हेतु किसी अधिकारी की सेवा-अवधि कम से कम छह महीने शेष होनी चाहिए, ताकि स्थिरता और योग्यता सुनिश्चित की जा सके।
मिश्रा को उनकी सेवानिवृत्ति से 24 घंटे पहले डीजीपी नियुक्त करके, राज्य ने असल में उन्हें दो साल का सेवा विस्तार दे दिया।
भाषा अविनाश नरेश
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