संवैधानिक संस्थाओं को बहुत महत्व देते थे अरुण जेटली: वेंकैया नायडू

संवैधानिक संस्थाओं को बहुत महत्व देते थे अरुण जेटली: वेंकैया नायडू

संवैधानिक संस्थाओं को बहुत महत्व देते थे अरुण जेटली: वेंकैया नायडू
Modified Date: January 22, 2026 / 11:10 am IST
Published Date: January 22, 2026 11:10 am IST

नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा ) पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ऐसे नेता थे जो संवैधानिक संस्थाओं को बहुत महत्व देते थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राजनीतिक दलों को अपने हितों या महत्वाकांक्षाओं के लिए संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम नहीं करना चाहिए।

नायडू ने यह बात वकील सुमंत बत्रा द्वारा लिखित और ओम बुक्स इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘द लाइफ एंड लेगेसी ऑफ अरुण जेटली’ के बुधवार को हुए विमोचन के अवसर पर कही।

उन्होंने कहा कि जेटली के साथ उनका जुड़ाव उस समय से था, जब वे दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्य थे। उन्होंने कहा, “आपातकाल में हमें प्रशिक्षण मिला और हम घनिष्ठ मित्र बन गए।”

नायडू ने भाजपा के “मुख्य रणनीतिकार”, वित्त मंत्री और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में जेटली द्वारा निभाई गई भूमिकाओं में उनके “राजनीतिक कौशल और मानवीय शक्ति” की सराहना की। उन्होंने कहा, “जेटली ऐसे नेता थे जो संवैधानिक संस्थाओं को बहुत महत्व देते थे। आज के समय में यह गुण दुर्लभ होता जा रहा है।’’

उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने राजनीतिक उद्देश्यों या महत्वाकांक्षाओं के लिए संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम नहीं करना चाहिए। ‘‘जेटली के जीवन और कार्य से हमें यही सीख मिलती है।”

नायडू ने कहा कि कई बार असहमति के लिए “मजबूत और बाध्यकारी कारण” हो सकते हैं और आज की राजनीतिक स्थिति में यह और भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा, “तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत करने और विपक्ष के तर्कों को तार्किक ढंग से खारिज करने की क्षमता होनी चाहिए। आज की राजनीति में यह समझना जरूरी है कि हम दुश्मन नहीं, केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। यह मूल बात सभी राजनीतिक दलों को माननी और सम्मानित करनी चाहिए।”

नायडू ने कहा कि विपरीत दृष्टिकोण को समझने, उसमें सकारात्मक पहलुओं को देखने और फिर निष्कर्ष पर पहुंचने की क्षमता होनी चाहिए।”

उन्होंने जेटली की समस्याओं के हल करने की क्षमता की भी सराहना की और कहा, “अर्थव्यवस्था या पार्टी के भीतर संवैधानिक मुद्दों से संबंधित कोई भी समस्या हो, हम अरुण जेटली की ओर देखते थे।”

नायडू ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक के पारित होने से जुड़ा एक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि जेटली उन्हें कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से मिलने उनके आवास पर ले गए थे।

उन्होंने कहा, “जब जीएसटी आया तो अरुण ने कहा कि चलिए सोनिया जी के घर चलते हैं। उन्होंने कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे को भी बुलाया और अंततः इस ऐतिहासिक सुधार पर व्यापक सहमति बनी।”

राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने जेटली को “सेंट्रल हॉल का प्रतीकात्मक व्यक्ति” बताया। उन्होंने कहा, “संसद का सेंट्रल हॉल कोई जगह या इमारत नहीं, बल्कि एक अवधारणा है। वहां कोई भी, किसी के साथ बैठकर खुलकर बातचीत कर सकता है।”

सिंघवी ने कहा कि बांग्लादेश या पाकिस्तान में पूर्व और वर्तमान सरकारों के लोग सौहार्द के साथ एक साथ नहीं बैठ सकते, लेकिन ऐसा भारत में संभव हुआ और जेटली इसका अभिन्न हिस्सा थे। उन्होंने कहा, “वह उस दौर के व्यक्ति थे। शायद वह दौर अब बीत रहा है या कम होता जा रहा है। तकनीकी रूप से कहें तो अब हमारे पास भौतिक रूप से सेंट्रल हॉल भी नहीं है।”

उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए.के. सीकरी ने जेटली को एक “उत्कृष्ट वक्ता” और “मेधावी छात्र” के रूप में याद करते हुए कहा कि उन्होंने जेटली के साथ कॉलेज में पढ़ाई की थी। उन्होंने कहा, “वह सच्चे राष्ट्रवादी थे और चाहते थे कि भारत समृद्ध बने।”

नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने बताया कि उन्होंने जेटली को पहली बार 1974 में देखा था, जब दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जयप्रकाश नारायण को विश्वविद्यालय परिसर में एक विशाल रैली को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था।

उन्होंने इसे “प्रेरणादायक क्षण” बताया और कहा कि जेटली ने उन्हें एक आईएएस अधिकारी के रूप में केरल से केंद्र में आने में मदद की। उन्होंने जेटली की कानून का मसौदा तैयार करने की “अद्वितीय क्षमता” की भी सराहना करते हुए कहा, “उनके बिना जीएसटी और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता से जुड़े विधेयक पारित नहीं हो पाते।”

वरिष्ठ अधिवक्ता और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने उस घटना को याद किया जब वह जेटली के साथ लंदन गए थे, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की मोहम्मद अली जिन्ना पर टिप्पणी के बाद देश में राजनीतिक संकट पैदा हो गया और जेटली को लैंडिंग के आधे घंटे के भीतर ही लौटना पड़ा।

पुस्तक में बत्रा ने 1970 के दशक में एक सक्रिय छात्र नेता से लेकर भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक बनने तक जेटली की यात्रा का विवरण दिया है।

भाषा मनीषा वैभव

वैभव


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