राजस्थान के किशनगढ़ में एशिया का सबसे बड़ा मार्बल अपशिष्ट निपटान स्थल बना प्रदूषण का ‘हॉटस्पॉट’

राजस्थान के किशनगढ़ में एशिया का सबसे बड़ा मार्बल अपशिष्ट निपटान स्थल बना प्रदूषण का ‘हॉटस्पॉट’

राजस्थान के किशनगढ़ में एशिया का सबसे बड़ा मार्बल अपशिष्ट निपटान स्थल बना प्रदूषण का ‘हॉटस्पॉट’
Modified Date: July 19, 2026 / 05:37 pm IST
Published Date: July 19, 2026 5:37 pm IST

(गुंजन शर्मा)

नयी दिल्ली, 19 जुलाई (भाषा) राजस्थान के किशनगढ़ स्थित एशिया का सबसे बड़ा मार्बल (संगमरमर) अपशिष्ट निपटान स्थल ‘‘प्रदूषण का प्रमुख केंद्र’’ बन गया है जबकि यह क्षेत्र एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। इस जगह पर ‘पीएम 2.5’ का स्तर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की निर्धारित सीमा से 4 से 12 गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पाया गया है। एक नए शोध में यह जानकारी सामने आई है।

यह शोध राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। यह पहला वैज्ञानिक शोध है, जो साफ-सुथरा दिखाई देने वाले मार्बल अपशिष्ट निपटान स्थल के खतरनाक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का दस्तावेजीकरण किया गया है।

शोध का नेतृत्व करने वाले राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया कि यह पहला अध्ययन है, जिसमें मार्बल अपशिष्ट निपटान स्थान के 15 किलोमीटर के दायरे में सिंचित और वर्षा आधारित कृषि भूमि, भूजल और वायु गुणवत्ता का आकलन किया गया।

इसके साथ ही परमाणु अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी (एएएस) तकनीक से प्रदूषकों की सांद्रता और एक्स-रे विवर्तन (एक्सआरडी) विश्लेषण के माध्यम से प्रदूषण के खनिजीय स्वरूप का अध्ययन किया गया।

एएएस तकनीक के जरिए मिट्टी और पानी में मौजूद धातुओं तथा अन्य प्रदूषकों की मात्रा का पता लगाया जाता है।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि मार्बल की धूल के लगातार संपर्क का संबंध पर्यावरणीय क्षरण और लोगों द्वारा बताई गई स्वास्थ्य समस्याओं से हो सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि पर्यावरण की नियमित निगरानी, प्रभावी नियामक नियंत्रण और जनस्वास्थ्य संबंधी हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक हैं।

प्रोफेसर शर्मा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘पीएम 2.5 का स्तर सीपीसीबी की सीमा से 4 से 12 गुना और डब्ल्यूएचओ की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि मार्बल प्रसंस्करण इकाइयों के आसपास लोग लंबे समय तक सांस के जरिए बेहद सूक्ष्म धूल कणों के संपर्क में रहते हैं। सबसे अधिक प्रदूषण उस समय दर्ज किया गया, जब औद्योगिक गतिविधियां चरम पर थीं और तेज सतही हवाएं चल रही थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उड़ने वाली मार्बल धूल प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है।’’

‘पीएम 2.5’ का अभिप्राय हवा में मौजूद ऐसे कण से है जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है।

प्रोफेसर शर्मा ने कहा, ‘‘स्वास्थ्य पर इसका असर भी स्पष्ट दिखाई देता है। सर्वेक्षण में 53 प्रतिशत स्थानीय निवासियों और 70 प्रतिशत मार्बल उद्योग के श्रमिकों ने सांस लेने में कठिनाई की शिकायत की, जबकि 56 से 84 प्रतिशत लोगों ने गले से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया।’’

अध्ययन में पाया गया कि प्रदूषण संबंधी निष्कर्ष स्वास्थ्य सर्वेक्षण में सामने आई त्वचा रोगों और श्वसन संबंधी बीमारियों की अधिकता से मेल खाते हैं। ये दोनों समस्याएं आमतौर पर भारी धातुओं के संपर्क और प्रदूषित धूल के लगातार सांस के जरिए शरीर में जाने से जुड़ी होती हैं।

प्रोफेसर शर्मा ने बताया, ‘‘मिट्टी के एक्सआरडी विश्लेषण से यह प्रमाण मिला है कि मार्बल अपशिष्ट का निपटान आसपास की मिट्टी में भारी धातुओं की मात्रा बढ़ाने का कारण बन सकता है। हालांकि, प्रदूषण की तीव्रता अपशिष्ट निपटान स्थल से दूरी बढ़ने के साथ कम होती जाती है।’’

करीब 350 एकड़ में फैले इस स्थान पर प्रतिदिन 700 से अधिक टैंकर द्वारा लगभग 22 लाख लीटर मार्बल स्लरी (संगमरमर का अपशिष्ट घोल) डाली जाती है।

अपने बर्फ जैसे सफेद और आकर्षक स्वरूप के कारण यह स्थान ‘प्री-वेडिंग फोटोशूट’, व्यावसायिक शूटिंग और पर्यटन के लिए बेहद लोकप्रिय हो गया है। यहां प्रतिदिन करीब 5,000 पर्यटक आते हैं, जबकि सप्ताहांत और छुट्टियों में यह संख्या 20,000 तक पहुंच जाती है।

हालांकि, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे न केवल एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम, बल्कि अत्यधिक प्रदूषण वाला स्थान भी बताया है।

शोध के सह-लेखक और राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी बसंत बिजारणिया ने बताया कि अध्ययन के दौरान आसपास की मिट्टी और भूजल में भारी धातुएं पाई गईं और उनकी सांद्रता अपशिष्ट निपटान स्थान से दूरी बढ़ने के साथ घटती गई।

उन्होंने कहा, ‘‘यह स्थानिक पैटर्न स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मार्बल अपशिष्ट स्थानीय स्तर पर भारी धातु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है।’’

भाषा शफीक सुभाष

सुभाष


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