भारतीय उपमहाद्वीप में सातवीं सदी से धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित हमले किए गए: एनसीईआरटी पुस्तक

भारतीय उपमहाद्वीप में सातवीं सदी से धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित हमले किए गए: एनसीईआरटी पुस्तक

भारतीय उपमहाद्वीप में सातवीं सदी से धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित हमले किए गए:  एनसीईआरटी पुस्तक
Modified Date: September 29, 2026 / 04:57 pm IST
Published Date: September 29, 2026 4:57 pm IST

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा नौ की सामाजिक विज्ञान की नयी पाठ्यपुस्तक के अनुसार, सातवीं शताब्दी से भारतीय उपमहाद्वीप ने क्षेत्रीय विस्तार और धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित कई आक्रमणों का सामना किया।

‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड – पार्ट 2’ शीर्षक वाली यह पुस्तक नए शैक्षणिक सत्र के शुरू होने के छह महीने बाद मंगलवार को जारी की गई। इस पाठ्यपुस्तक का पहला भाग जून में जारी किया गया था।

पाठ्यपुस्तक में लिखा है, ‘‘सातवीं शताब्दी के बाद से, भारतीय उपमहाद्वीप ने क्षेत्रीय विस्तार और धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित आक्रमणों के क्रमिक चरणों को देखा। यह भी गौर करने की बात है कि बारहमासी नदी प्रणालियों से सिंचित उपजाऊ मैदानों की अधिशेष कृषि उपज ने लोगों की आर्थिक भलाई में योगदान दिया और यह आक्रमणों का एक प्रमुख कारण भी बना।’’

‘‘रजिस्टेंट एंड रीजीलियन्स’’ (प्रतिरोध और लचीलापन) शीर्षक वाले अध्याय में इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया है कि भारतीय शासकों और समुदायों ने अरब, तुर्क, मुगल और यूरोपीय ताकतों के खिलाफ कब और कैसे प्रतिरोध किया।

अध्याय में लिखा है, ‘‘सातवीं शताब्दी के मध्य से, अरब ताकतों ने समुद्र और जमीन के रास्ते आक्रमण शुरू किए। इन शुरुआती आक्रमणकारियों का दक्कन, मालवा, कश्मीर और राजस्थान के भारतीय शासकों ने डटकर मुकाबला किया और उन्हें खदेड़ दिया। गजनी (वर्तमान अफगानिस्तान और उत्तर-पूर्वी ईरान में) के सुल्तान महमूद ने 1001 में हिंदू शाही राजवंश के जयपाल के खिलाफ अपना पहला आक्रमण किया था।’’

अध्याय में आगे बताया गया है कि कैसे 11वीं और 12वीं शताब्दियों के दौरान, उत्तरी और पश्चिमी भारत ने तुर्की आक्रमणों का दंश झेला, जबकि प्रायद्वीपीय भारत तुर्की नियंत्रण से मुक्त रहा।

पुस्तक में मुगल साम्राज्य के खिलाफ जाटों के प्रतिरोध का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि गंगा-यमुना दोआब में रहने वाले इस समुदाय को भारी करों और शोषण का सामना करना पड़ा और उन्होंने 1669 में गोकुल जाट के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।

पाठ्यपुस्तक में सिख प्रतिरोध और गुरु अर्जन देव तथा गुरु तेग बहादुर की शहादत का भी विवरण दिया गया है। इसमें सिख समुदाय के बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण 17वीं शताब्दी की शुरुआत से सिख मामलों में बढ़ते मुगल राज्य के हस्तक्षेप को समझाया गया है।

भाषा वैभव माधव

माधव


लेखक के बारे में