अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है बंगाल का गोमिरा नृत्य
अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है बंगाल का गोमिरा नृत्य
(सौगत मुखोपाध्याय)
दक्षिण दिनाजपुर, 28 जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले में बांस के घने जंगल में एक स्थान पर ढल रही शाम के बीच माधव सरकार (57) अपने बेटे को उसकी पोशाक पहनाने में व्यस्त हैं। वह नृत्य दल में शामिल अपने पुत्र को काली ‘स्पैन्डेक्स’ के ऊपर हाथ से कढ़ाई कर तैयार की गई चमकदार लाल पोशाक सावधानी से पहनाते हैं।
इस स्थान के पास ही गांव का एक जर्जर मंदिर है। स्थानीय भाषा में ‘थान’ कहा जाने वाला यह धर्मस्थल अंधेरे के कारण दूर से बमुश्किल दिखाई पड़ता है।
इस क्षेत्र को यहां जल रहे एक अलाव और इसके आसपास रखी कुछ मशालों से रोशन किया गया है। इस स्थान पर भारी भीड़ भी जुटी है जो अपने देवताओं को धरती पर उतरकर नाचते देखने के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रही है।
माधव सरकार गोमिरा नृत्यकला के लगभग 20 नर्तकों के एक दल का नेतृत्व करते हैं।
गोमिरा एक मुखौटा आधारित लोक कला है जिसकी जड़ें अनुष्ठानों और पौराणिक कथाओं में निहित हैं। कलाकार भारी, जटिल नक्काशी वाले लकड़ी के मुखौटे धारण करते हैं।
इन मुखौटों पर ‘बुरा-बुरी’ (भगवान शिव और देवी पार्वती को दर्शाने वाले), देवी काली, विष्णु के नरसिंह अवतार और साथ ही राक्षसों तथा जानवरों के चित्र बने होते हैं।
यहां एक समूह लगातार ढोल और काशी (पीतल की प्लेट) बजाता है जिसपर नर्तक खुले मैदान में अपने अस्थायी मंच पर प्रदर्शन करते हैं।
पौराणिक प्रतीकों से परिपूर्ण, प्रत्येक प्रस्तुति का उद्देश्य दुष्ट शक्तियों को दूर करना और देवताओं का आशीर्वाद पाना है, ताकि नई बुआई के मौसम का शुभारंभ सुनिश्चित किया जा सके।
सरकार प्रस्तुति के लिए बने मंच पर कलाकारों के प्रदर्शन के क्रम को निर्धारित करते हैं व उनकी पोशाक को तत्काल बदलने का काम संभालते हैं।
प्रस्तुति के चरम पर पहुंचने के बीच सर्दी के बावजूद सरकार के माथे पर पसीने की बूंदे उभर आईं हैं। वह पूरी मेहनत के साथ काम में जुटे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि कुछ ही दिनों में स्थानीय क्लबों या उत्सव समितियों से बुकिंग कम हो जाएंगी और शायद ‘चैत्र’ तक, जो बंगाली कैलेंडर का अंतिम महीना है और आमतौर पर मार्च-अप्रैल के बीच आता है, कोई और अवसर न मिले।
सरकार ने कहा, ‘‘मैंने नृत्य और इसकी बारीकियां अपने पिता से सीखी हैं, जिन्हें मेरे दादाजी ने प्रशिक्षित किया था। यह हमारे खून में है। मैं अपने बेटे को अपना उत्तराधिकारी बनने के लिए तैयार कर रहा हूं।’’
साथ ही उन्होंने कहा कि अन्य लोगों के लिए हालांकि स्थितियां ऐसी नहीं है।
सरकार ने कहा, ‘‘मेरे साथ काम करने वाले लोग अक्सर मुझसे कहते हैं कि उनके बच्चों की अब इस कला का अभ्यास करने में रुचि नहीं हैं।’’
उन्होंने कहा कि गोमिरा की परंपरा 150 साल से भी अधिक पुरानी है, लेकिन लगातार बुकिंग नहीं मिलने और कम रूचि के कारण नयी पीढ़ी इस नृत्य की कठिन, साल भर चलने वाली अभ्यास प्रणाली को बनाए रखने में हिचकिचा रही है।
उन्होंने कहा, “हम साल के अन्य समय में खेती-बाड़ी में लगे रहते हैं, लेकिन अपनी कड़ी अभ्यास दिनचर्या में कभी ढील नहीं डालते। लेकिन मुझे नहीं पता कि इसे कैसे बनाए रखें, क्योंकि लोग यहां तक कि गांवों में भी, इस नृत्य रूप में अब दिलचस्पी नहीं लेते।”
एक समय दिनाजपुर और आसपास के जिलों में लोकप्रिय रहे गोमिरा, अब लगभग केवल कुशमंडी ब्लॉक तक ही सीमित रह गया है, जहां लगभग सौ के करीब नर्तक, विभिन्न दलों में विभाजित होकर, अभी भी इस कला का अभ्यास कर रहे हैं।
भाषा यासिर पवनेश
पवनेश

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