बिहार में शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में विफल, सरकार को इसे वापस लेना चाहिए: अध्ययन

बिहार में शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में विफल, सरकार को इसे वापस लेना चाहिए: अध्ययन

बिहार में शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में विफल, सरकार को इसे वापस लेना चाहिए: अध्ययन
Modified Date: August 8, 2026 / 09:00 pm IST
Published Date: August 8, 2026 9:00 pm IST

नयी दिल्ली, आठ अगस्त (भाषा) आर्थिक शोध संस्थान ‘नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर)’ के एक शोध पत्र में कहा गया है कि बिहार को शराबबंदी वापस ले लेनी चाहिए, क्योंकि यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी रोकने में विफल रही है। इसमें कहा गया है कि अनुभव आधारित साक्ष्य बताते हैं कि शराब की कानूनी बिक्री पर रोक के बाद अवैध शराब और नशीले पदार्थों के सेवन में बढ़ोतरी हुई है।

‘बिहार के विकास की उपलब्धियों, अधूरे एजेंडे और आगे की राह का व्यापक परिप्रेक्ष्य’ शीर्षक वाले इस शोध पत्र में कहा गया है कि शराबबंदी से पहले के स्तर पर आबकारी कर को फिर से लागू करने से राज्य के अपने राजस्व में 14-15 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है और प्रवर्तन तथा तस्करी रोधी अभियानों पर होने वाले खर्च में कमी आएगी।

रत्ना सहाय के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों की एक टीम द्वारा तैयार किए गए और ‘इंडिया पॉलिसी फोरम’ में प्रस्तुत किए गए इस शोध पत्र में कहा गया है कि अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करने के पीछे मुख्य कारण यह धारणा थी कि शराब का सेवन घरेलू हिंसा में बड़ी भूमिका निभाता है और परिवार की आय का इस्तेमाल अधिक उपयोगी कार्यों में किया जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि महिला समूहों और कार्यकर्ताओं ने शराबबंदी का जोरदार समर्थन किया था। उनका तर्क था कि इससे शराब से जुड़ी हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं में कमी आएगी।

शोध पत्र में कहा गया, ‘‘अब हमारे पास पर्याप्त आंकड़े और जानकारी उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर यह आकलन किया जा सकता है कि शराबबंदी प्रभावी रही या नहीं। बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कमी नहीं आई है। इसके बजाय, 2016 के बाद की अवधि में महिलाओं के खिलाफ कुल दर्ज अपराधों में बढ़ोतरी हुई है।’’

शोध पत्र के अनुसार, उपलब्ध साक्ष्यों से यह संकेत नहीं मिलता कि शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में व्यापक स्तर पर कमी आई है।

इसमें यह भी कहा गया है कि शराबबंदी व्यवस्था के साथ अवैध शराब के कारोबार के विस्तार, कानून लागू करने में बढ़ती चुनौतियों और भ्रष्टाचार की चिंताओं के अलावा नशीले पदार्थों समेत अन्य मादक पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल की समस्या भी सामने आई है।

शोध पत्र में कहा गया, ‘‘इसी अवधि में अवैध शराब के कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे शराब की खपत बढ़ी, अपराध और भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ तथा मादक पदार्थों के इस्तेमाल में भी बढ़ोतरी हुई।’’

शोध पत्र के लेखकों ने कहा कि उनकी राय में अब ऐतिहासिक स्तर पर आबकारी कर को फिर से लागू करने का समय आ गया है, ताकि राज्य के राजस्व में इसकी हिस्सेदारी फिर से 14 प्रतिशत तक पहुंच सके।

भाषा आशीष पवनेश

पवनेश


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