उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा पार्षदों ने दोबारा शपथ ली

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा पार्षदों ने दोबारा शपथ ली

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा पार्षदों ने दोबारा शपथ ली
Modified Date: June 24, 2026 / 09:11 pm IST
Published Date: June 24, 2026 9:11 pm IST

तिरुवनंतपुरम, 24 जून (भाषा) तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी के 19 पार्षदों ने केरल उच्च न्यायालय द्वारा उनकी पहले ली गई शपथ को कानून द्वारा निर्धारित प्रारूप के अनुरूप न होने के कारण अवैध घोषित किए जाने के कुछ घंटों बाद बुधवार को दोबारा शपथ ली।

निगम मुख्यालय में शपथ ग्रहण का नया समारोह आयोजित किया गया, जहां महापौर वी. वी. राजेश ने अदालत के निर्देशानुसार शपथ दिलाई।

पार्षदों ने जल्दबाजी में आयोजित एक समारोह में ईश्वर के नाम पर फिर से शपथ ली।

एक पार्षद (सुगाथन) शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो सके, क्योंकि वह अभी केएपीए मामले में जेल में हैं।

केरल उच्च न्यायालय ने आज सुनाए गए फैसले में कहा कि निर्वाचित स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों को कानून में निर्धारित तरीके से ही शपथ लेनी होगी। अदालत ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई पार्षदों द्वारा ली गई उन शपथों को अमान्य करार दिया, जिनमें उन्होंने ‘ईश्वर’ या ‘सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान’ के बजाय अन्य नामों का उल्लेख किया था।

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने अपने फैसले में कहा कि केरल नगरपालिका अधिनियम और केरल पंचायत राज अधिनियम के तहत निर्वाचित सदस्यों को शपथ या तो ‘‘ईश्वर के नाम पर’’ या ‘‘सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान’’ के साथ लेनी होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि शपथ लेते समय किसी विशेष देवी-देवता, ‘‘भारत माता’’, किसी राजनीतिक आंदोलन के शहीदों, संगठन या व्यक्ति का नाम शामिल करने की अनुमति इन कानूनों में नहीं है।

यह मामला तब सामने आया, जब तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों ने विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं, ‘भारतंबा’, ‘भारत माता’, गुरुदेव और राजनीतिक आंदोलन के शहीदों के नाम पर शपथ ली थी।

अदालत ने कहा कि शपथ लेना मतदाताओं के प्रति एक गंभीर वचन है कि निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान का सम्मान करेगा, कानून के शासन का पालन करेगा और ईमानदारी से जनता की सेवा करेगा; इसलिए शपथ ठीक उसी रूप में दिलाई जानी चाहिए, जैसा कानून में निर्धारित है।

न्यायमूर्ति कुन्हीकृष्णन ने स्पष्ट किया कि नागरिकों को किसी भी देवी-देवता की पूजा करने या किसी भी धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन कानून में निर्धारित शपथ के प्रारूप में किसी प्रकार का जोड़ या बदलाव स्वीकार्य नहीं है।

फैसले में कहा गया, “जब किसी कानून में शपथ लेने का एक विशेष तरीका निर्धारित किया गया हो… तब ‘ईश्वर’ शब्द का विस्तार करना स्वीकार्य नहीं है।”

भाषा शुभम सुरेश

सुरेश


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