दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘बहिष्कार’ को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त: न्यायालय को बताया गया
दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘बहिष्कार’ को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त: न्यायालय को बताया गया
नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) दाऊदी बोहरा समुदाय के एक संगठन ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि ‘बहिष्कार’ की उनकी प्रथा संरक्षित है और संवैधानिक नैतिकता का उपयोग संविधान के तहत प्रदत्त अधिकारों को प्रतिबंधित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस प्रश्न की भी पड़ताल कर रही है कि क्या किसी समुदाय के धार्मिक प्रमुख की किसी सदस्य को धार्मिक जीवन से निष्कासित करने की शक्ति अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति के धर्म को मानने और उसका पालन करने के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है।
संगठन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि प्रत्येक धर्म के अपने नैतिक मूल्य होते हैं, जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हो सकते हैं।
रोहतगी ने दिगंबर जैन संतों और नगा साधुओं की प्रथा का हवाला देते हुए कहा कि वस्त्रहीनता को धार्मिक प्रथा के हिस्से के रूप में स्वीकार किया जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘जो एक के लिए नैतिक है, वह दूसरे के लिए नैतिक नहीं हो सकता और जो एक के लिए अनैतिक है, वह दूसरों के लिए अनैतिक नहीं हो सकता।’’
रोहतगी ने तर्क दिया कि इसी प्रकार, खान-पान की आदतें विभिन्न धर्मों में भिन्न होती हैं और हिंदू कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज कर सकते हैं जबकि मुसलमान अन्य खाद्य पदार्थों से परहेज कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ये धार्मिक विकास का हिस्सा हैं। इसमें पहनावे के नियम और प्रथाएं भी शामिल हैं। कुछ मंदिरों में नंगे बदन जाना पड़ता है। गुरुद्वारों में सिर ढकना अनिवार्य है। कुछ मंदिर चमड़े की वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाते हैं। ये सामान्य रूप से नैतिकता के प्रश्न नहीं हैं, बल्कि धार्मिक रीति-रिवाजों और संप्रदायों से संबंधित विशिष्ट मामले हैं।’’
पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
रोहतगी ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने में संवैधानिक नैतिकता का कोई स्थान नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने भी दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से संक्षिप्त दलीलें प्रस्तुत कीं। वह बृहस्पतिवार को अपनी दलीलें जारी रखेंगे।
बंबई उच्च न्यायालय के 1962 के उस फैसले को चुनौती देने के मामले में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने नौ न्यायाधीशों की पीठ को यह मामला भेजा था, जिसमें बहिष्कार की शक्ति को संरक्षित धार्मिक प्रथा के रूप में बरकरार रखा गया था।
भाषा नेत्रपाल माधव
माधव

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