छात्रों की आत्महत्याओं का मामला : छत वाले पंखे हों या न हों, पर परामर्श देना जरूरी है
छात्रों की आत्महत्याओं का मामला : छत वाले पंखे हों या न हों, पर परामर्श देना जरूरी है
नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) देश के दो प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में एक के बाद एक आत्महत्या की घटनाएं सामने आने से छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इस बीच, आईआईटी मुंबई और बीआईटी मेसरा ने संभावित बचाव उपाय के तौर पर छात्रावास के कमरों से छत के पंखे हटाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
यह कदम तीन साल पहले कोटा में उठाए गए उपायों की याद दिलाता है, जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे 25 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद कोटा प्रशासन ने शहर के सभी छात्रावासों में ‘‘आत्महत्या रोधी स्प्रिंग वाले छत के पंखे’’ लगाने और बालकनियों तथा गलियारों में ‘‘आत्महत्या रोधी जाल’’ लगाने को अनिवार्य किया था।
आत्महत्या रोधी पंखों में स्प्रिंग की मदद से ऐसी बनावट होती है जिसमें 20 किलो या अधिक वजन लटकाने पर यह टूटकर या निकल गिर पड़ता है।
तब की तरह अब भी चिंता यह है कि संस्थान और प्रशासन समस्या की जड़ तक पहुंचने के बजाय केवल सतही उपायों पर ध्यान दे रहे हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि छतों पर लगने वाले पंखे हटाने या लगाने जैसे कदम छात्रों को आत्महत्या जैसे प्रयासों को रोकने के लिए सीमित असर वाले हो सकते हैं।
उन्होंने लगातार परामर्श की व्यवस्था और भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्रतिस्पर्धा की प्रकृति में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया।
उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त एक समिति की ओर से कराए गए देशव्यापी सर्वेक्षण से समस्या की गंभीरता का पता चलता है।
पीटीआई-भाषा को मिली जानकारी के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों के करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में ऐसे दौर का अनुभव किया जब वे खुद को बेहद तनावग्रस्त या परेशान महसूस कर रहे थे, जबकि नौ प्रतिशत ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
सर्वेक्षण के ये निष्कर्ष राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) की अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा बनने की उम्मीद है, जिसे 31 अक्टूबर तक सौंपे जाने की संभावना है।
चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक श्वेता शर्मा ने कहा कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) जैसे संस्थानों का माहौल भावनात्मक अभिव्यक्ति की अनुमति नहीं देता।
उन्होंने बताया कि उनके करीब 60 से 70 प्रतिशत मरीज आईआईटी और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) से हैं।
उन्होंने कहा कि ये छात्र अपनी उच्च बौद्धिक क्षमता और बेहतर प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं लेकिन ‘‘रिश्तों और सामाजिक मामलों से जुड़ी समस्याओं से सबसे ज्यादा जूझने वाले भी यही होते हैं।’’
शर्मा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। यह पंखा हो या वह पंखा, मुद्दा यह नहीं है। आप समस्या के सिर्फ भौतिक पहलू पर काम कर रहे हैं, जबकि उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता अब भी नहीं है।’’
शर्मा ने कहा कि छात्रों की संख्या के मुकाबले परामर्शदाताओं की संख्या कभी पर्याप्त नहीं होती।
आईआईटी में प्रवेश के लिए वर्षों तक पढ़ाई करने और फिर संस्थान में पहुंचने के बाद वहां की परिस्थितियों से तालमेल बैठाने के लिए संघर्ष करने वाले युवाओं को आखिर क्यों इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। 18 सितंबर को आईआईटी मुंबई के छात्र साहिल वाकोडे के अपने कमरे की छत से लटके पंखे पर झूल जाने के बाद इस मुद्दे पर चर्चा और गंभीर हो गई है।
सूत्रों ने बताया कि एक छात्र द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद जुलाई में ही छत पर लगने वाले पंखों को दीवार पर लगाए जाने वाले पंखों से बदलने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 से 2024-25 के बीच 23 आईआईटी में छात्रों की आत्महत्या के 45 मामले सामने आए और इनमें 28 मामले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से जुड़े थे।
एक अधिकारी ने बताया कि वाकोडे की मौत के अगले दिन बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा की एक छात्रा अपने कमरे में मृत मिली। कॉलेज अब छात्रावासों में छत्त पर लगाये जाने वाले पंखों को ‘‘आत्महत्या रोधी’’ पंखों से बदल रहा है।
वरिष्ठ चिकित्सक मैत्री चंद के अनुसार, छात्रों का खुद को नुकसान पहुंचाना एक ‘‘क्रमबद्ध समस्या’’ है और छत वाला पंखे हटाना ऐसा कदम है जो देखने में लोगों को आश्वस्त कर सकता है, ‘‘लेकिन जब कोई बच्चा या छात्र खुद को नुकसान पहुंचाना चाहता है या उसे ऐसा करने की जरूरत महसूस होती है, तो वह इसके लिए कोई न कोई रास्ता खोज लेता है।’’
उन्होंने कहा छत पर लगने वाले पंखे हटाने जैसे किसी उपाय को प्रभावी बनाने के लिए व्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत होगी।
चंद ने कहा, ‘‘संस्थान ऐसे परामर्श विभाग स्थापित कर सकते हैं जहां प्रशिक्षित चिकित्सक हों और जिन्हें बाल विकास की बारीकियों की समझ हो।’’
मार्च 2025 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने की जरूरत पर जोर दिया और राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) का गठन किया।
एनटीएफ की वेबसाइट के अनुसार, उसका उद्देश्य ‘‘छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करना, छात्रों की आत्महत्या कम करने के लिए बचाव के उपाय सुझाना और उच्च शिक्षण संस्थानों में सहायता प्रणालियों को मजबूत करना’’ है।
इस साल जनवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए ‘‘एक व्यवस्थित और व्यापक मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण व्यवस्था’’ स्थापित करना अनिवार्य कर दिया था।
दिल्ली अभिभावक संघ की अपराजिता गौतम ने कहा कि संस्थानों को छात्रों पर धौंस जमाने वाली बदमाशी की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और सतही उपायों से बचना चाहिए।
भाषा
राखी माधव
माधव

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