केरल के मुख्यमंत्री पद का शायद आखिरी मौका भी चूक गए चेन्निथला
केरल के मुख्यमंत्री पद का शायद आखिरी मौका भी चूक गए चेन्निथला
तिरुवनंतपुरम, 14 मई (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला के लिए केरल में पार्टी नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार में वापसी लगभग पांच दशक लंबे राजनीतिक सफर के बाद मुख्यमंत्री बनने का शायद सबसे उपयुक्त, और संभवतः अंतिम, मौका साबित हो सकती थी।
लेकिन यह पद अंततः वी डी सतीशन को देने का फैसला किया गया, जिन्होंने कभी पार्टी संगठन में उनके अधीन काम किया था। इस तरह चेन्निथला कांग्रेस आलाकमान और नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वर्षों की वफादारी के बावजूद एक बार फिर शीर्ष पद से चूक गए।
पार्टी द्वारा सतीशन को मुख्यमंत्री घोषित करने के तुरंत बाद, चेन्निथला सार्वजनिक नजरों से ओझल हो गए।
तिरुवनंतपुरम स्थित चेन्निथला के आवास के बाहर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों को उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला, क्योंकि वह चुपचाप घर से निकल गए। बताया जा रहा है कि वह गुरुवायूर श्री कृष्ण मंदिर गए।
कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं के बीच इस घटनाक्रम ने उस नेता के प्रति सहानुभूति पैदा की, जिन्हें केरल के सबसे वफादार लेकिन राजनीतिक रूप से कम भाग्यशाली कांग्रेस चेहरों में गिना जाता है।
चेन्निथला (70) लंबे समय से नेहरू-गांधी परिवार के करीबी सहयोगियों में शामिल रहे हैं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान वह नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के अध्यक्ष बने, और बाद में राजीव गांधी के समय में उन्होंने भारतीय युवा कांग्रेस का नेतृत्व किया।
उन वर्षों में चेन्निथला के साथ काम करने वाले कई नेता आगे चलकर मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने, जबकि उनका अपना राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ा।
दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों के रूप में उभरे सतीशन और कांग्रेस (संगठन) महासचिव के सी वेणुगोपाल दोनों ने अपने-अपने संगठनात्मक दौर में अलग-अलग समय पर चेन्निथला के अधीन काम किया था।
कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में से एक चेन्निथला ने हाल में हुए चुनाव में अलप्पुझा जिले की हरिपाद विधानसभा सीट पर भारी अंतर से जीत हासिल की, जिससे मध्य केरल में उनका मजबूत जनाधार एक बार फिर साबित हुआ।
अलप्पुझा जिले में मावेलिकारा के पास स्थित चेन्निथला में जन्मे रमेश चेन्निथला ने 1970 के दशक में केरल छात्र संघ (केएसयू) के जरिये राजनीति में प्रवेश किया और बाद में छात्र संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बने।
वर्ष 1986 में उन्हें के. करुणाकरण के मंत्रिमंडल में ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में शामिल किया गया, जिससे वह उस समय केरल के सबसे युवा मंत्रियों में से एक बन गए। बाद में चेन्निथला ने संसदीय राजनीति की ओर रुख किया और कोट्टायम तथा मावेलिकारा से कई लोकसभा चुनाव जीते।
हालांकि चेन्निथला को अलग-अलग दौर में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हर बार अपने राजनीतिक करियर को फिर से खड़ा किया और राज्य तथा राष्ट्रीय राजनीति दोनों में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी।
वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में यूडीएफ की हार के बाद, चेन्निथला केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए गए। हालांकि वह पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार के सबसे मुखर आलोचकों में से एक बनकर उभरे, लेकिन यूडीएफ 2021 में सत्ता में वापसी करने में विफल रही। इसके बाद, उनके स्थान पर वी डी सतीशन को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।
चेन्निथला प्रभावशाली हिंदू समुदाय संगठनों जैसे कि नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) और श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के लिए जाने जाते हैं।
कई बार शीर्ष पद के करीब पहुंचने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी चेन्निथला से लगातार दूर ही रही। उनके समर्थकों के लिए यह नया घटनाक्रम एक बार फिर उस पीड़ा की याद दिलाने वाला है कि पार्टी नेतृत्व के साथ दशकों तक मजबूती से खड़े रहने वाले नेता के हाथ से अंतिम क्षण में मौका फिर फिसल गया।
भाषा आशीष माधव
माधव

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