चीन के नये जातीय कानून का मकसद विविधता की जगह एकरूपता लाना: केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रमुख
चीन के नये जातीय कानून का मकसद विविधता की जगह एकरूपता लाना: केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रमुख
नयी दिल्ली, 26 जून (भाषा) केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के सिक्योंग (राजनीतिक नेता) पेन्पा सेरिंग ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि चीन का नया जातीय कानून ‘‘राष्ट्रीय एकता की आड़ में’’ समावेशन की नीतियों को संस्थागत बनाना चाहता है तथा संवाद की जगह जोर-जबरदस्ती करने और विविधता की जगह एकरूपता लाना चाहता है।
यहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने संबोधन में, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए चीन तिब्बत में ‘‘कोई नयी व्यवस्था नहीं बना रहा है’’, बल्कि ‘‘पुरानी व्यवस्था को कानूनी रूप दे रहा है।’’ उन्होंने कहा कि उसकी ‘‘शब्दावली बदल गई है, लेकिन मकसद नहीं।’’
चीन में जातीय मामलों से जुड़े एक अहम कानून, ‘जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून’, को चीन की संसद ने 12 मार्च को पारित किया था। यह कानून 1 जुलाई से लागू होगा।
इस कानून के बनने के कुछ ही समय बाद, निर्वासित तिब्बती संसद ने मार्च में धर्मशाला में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया और कहा, ‘‘हम न केवल इस कानून का विरोध करते हैं, बल्कि इसे पूरी तरह से गैर-कानूनी मानते हुए खारिज भी करते हैं।’’
तिब्बती निर्वासित सरकार के प्रमुख सेरिंग ने कहा, ‘‘सात सूत्री प्रस्ताव में, हमने जबरन समावेश करने के उपाय के रूप में इसकी निंदा की है, जिसका अंतिम उद्देश्य तिब्बती भाषा, धर्म, संस्कृति और पहचान का क्रमिक रूप से क्षरण करना है।’’
उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘हमने इस बात पर भी जोर दिया कि यह कानून न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकार मानकों के खिलाफ है, बल्कि चीन के अपने संविधान और क्षेत्रीय जातीय स्वायत्तता से जुड़े चीनी कानून में शामिल सिद्धांतों को भी कमजोर करता है।’’
सेरिंग ने कहा कि वह इस मुद्दे पर 1 जुलाई या उससे पहले विश्व के अन्य देशों की सरकारों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करेंगे और चीन के इस नये कानून के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अधिक से अधिक सरकारों से संपर्क करेंगे।
सेरिंग ने कहा, ‘‘हम सभी को मिलकर इसका सामना करना होगा। हम अकेले ऐसा नहीं कर सकते।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि नया कानून ‘‘राष्ट्रीय एकता के नाम पर समावेशीकरण की नीतियों को संस्थागत रूप देता है। यह संवाद की जगह जोर-जबरदस्ती को और विविधता की जगह एकरूपता को स्थापित करता है।’’
सिक्योंग ने कहा, ‘‘ऐसा दृष्टिकोण स्थायी स्थिरता नहीं ला सकता, क्योंकि भय पर आधारित शांति कभी टिकाऊ नहीं होती। किसी समुदाय की भाषा, धर्म और संस्कृति को मिटाकर प्राप्त की गई एकता न तो वास्तविक होती है और न ही न्यायपूर्ण।’’
सेरिंग ने कहा कि चीन के सामने विकल्प स्पष्ट है — या तो वह ‘‘जोर-जबरदस्ती के रास्ते’’ पर चलता रहे, जिससे अविश्वास और गहरा होगा और दुनिया के सबसे पुराने अनसुलझे विवादों में शामिल यह मुद्दा और लंबा खिंचेगा, या फिर वह दलाई लामा और सीटीए की मध्यमार्ग की नीति के तहत संवाद, सुलह और पारस्परिक सम्मान के रास्ते पर चले।
सेरिंग ने रेखांकित किया कि चीन-तिब्बत विवाद को सुलझाने के लिए सीटीए के दृष्टिकोण के केंद्र में मध्य मार्ग है।
सिक्योंग ने कहा कि चार दशक से अधिक समय से दलाई लामा ने बातचीत और मेल-मिलाप के प्रति अपनी प्रतिबद्धता लगातार प्रदर्शित की है। उनका मानना है कि स्थायी शांति जोर-जबरदस्ती से नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान से ही हासिल की जा सकती है।
सीटीए हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित है, जहां 14वें और मौजूदा दलाई लामा (90) भी रहते हैं।
भाषा सुभाष नरेश
नरेश

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