कांग्रेस ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के कदमों को ‘सुविधाजनक रूप से’ भुला दिया: सूत्र

कांग्रेस ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के कदमों को 'सुविधाजनक रूप से' भुला दिया: सूत्र

कांग्रेस ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के कदमों को ‘सुविधाजनक रूप से’ भुला दिया: सूत्र
Modified Date: May 12, 2026 / 10:25 pm IST
Published Date: May 12, 2026 10:25 pm IST

नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मितव्ययिता की अपील की आलोचना करने को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाते हुए सूत्रों ने मंगलवार को कहा कि विपक्षी दल ने पूर्ववर्ती सरकारों के कदमों को ‘‘सुविधाजनक रूप से’’ भुला दिया।

सूत्रों ने जवाहरलाल नेहरू के भारत-चीन युद्ध के दौरान नागरिकों से सोना दान करने का आह्वान, इंदिरा गांधी के सोने के खिलाफ ‘‘युद्ध’’ की घोषणा और मनमोहन सिंह की ‘‘पैसा पेड़ों पर नहीं उगता’’ वाली टिप्पणी का जिक्र किया।

सूत्रों के अनुसार, जहां प्रधानमंत्री मोदी की अपील वैश्विक उथल-पुथल के बीच मजबूत अर्थव्यवस्था में विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से प्रेरित है, जबकि कांग्रेस नेताओं के कदम आर्थिक मजबूरी और संकट की स्थिति से प्रेरित थे।

सूत्रों ने कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने ‘‘चार महीनों में सोने को लेकर चार हताश अपील’’ की थीं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की ओर से मजबूत स्थिति में की गई एक जिम्मेदार अपील को अब ‘‘संकट’’ बताया जा रहा है। सूत्रों ने कहा कि ‘‘यह पाखंड चौंकाने वाला है।’’

वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नागरिकों से सोने की खरीद कम करने, पेट्रोल और डीजल की खपत घटाने और खाना पकाने के तेल का कम उपयोग करने का आग्रह किया है। सूत्रों के अनुसार, यह सलाह दूरदर्शी और राजनेता जैसी थी, लेकिन कांग्रेस और उसके समर्थकों ने तुरंत घोषणा कर दी कि भारत की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुकी है और उन्होंने पिछली कांग्रेस सरकारों द्वारा देश के विभिन्न संकटों के समय उठाए गए कदमों को याद दिलाया।

एक सूत्र ने कहा, ‘‘आज कांग्रेस जिन अपील की आलोचना कर रही है, वही उनके अपने नेताओं ने पहले कहीं अधिक आपात स्थिति में की थीं। उन्होंने सिर्फ हालात को और बिगाड़ा, जिसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ा।’’

वर्ष 1962 में, भारत-चीन युद्ध के दौरान, तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने नागरिकों से केवल सोने की खरीद कम करने की अपील ही नहीं की थी। उन्होंने एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया था जिसमें भारतीयों से अपने सोने के आभूषण राष्ट्रीय युद्ध कोष में दान करने का आग्रह किया गया था।

सूत्र ने कहा, ‘‘पूरे भारत में महिलाओं ने अपने गहने सौंप दिए। अपने मंगलसूत्र, अपनी चूड़ियां, अपनी विरासत सब। सरकार ने इसे देशभक्ति अभियान के रूप में पेश किया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने दशकों तक इस त्याग का जश्न मनाया। यह कोई साधारण अपील नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय संकट के दौरान व्यक्तिगत संपत्ति के बड़े पैमाने पर संग्रह का अभियान था।’’

सूत्रों ने कहा कि जहां प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से स्वेच्छा से सोने की खरीद कम करने की अपील की, वहीं नेहरू ने लोगों से अपने सोने को वास्तव में दान करने के लिए कहा था। इसके बावजूद कांग्रेस ने नेहरू की सराहना की और मोदी की आलोचना की।

उन्होंने कहा कि 1962 के स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम ने सोने के स्वामित्व और व्यापार पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए। बैंकों को स्वर्ण ऋण वापस लेने का आदेश दिया गया और सोने के वायदा कारोबार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। 1963 तक 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले जेवरात बनाना भी एक दंडनीय अपराध बन गया था।

सूत्र ने कहा, ‘‘1968 में स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम, 1962 को फिर से लागू किया गया। नागरिकों को सोने की छड़ें या सिक्के रखने से कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह केवल हतोत्साहित करने वाली बात नहीं थी, बल्कि स्पष्ट रूप से निषिद्ध था।’’

सूत्र ने बताया, ‘‘कांग्रेस ने सोने के स्वामित्व को अपराध घोषित किया, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वैच्छिक संयम बरतने का आह्वान किया। इसके बावजूद कांग्रेस उन पर हमला करने का साहस दिखा रही है।’’

सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल सार्वजनिक अपील की, बल्कि संसद में ही सोने के खिलाफ ‘युद्ध की घोषणा’ कर दी।

वर्ष 2013 में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम ने भारतीयों से सोना खरीदना बंद करने के लिए एक नहीं बल्कि चार बार अलग-अलग अपील की थी। भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के रिकॉर्ड 5.4 प्रतिशत तक पहुंच गया था, और सोने का आयात इसका मुख्य कारण था।

सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस की नागरिकों की उपभोग आदतों को लेकर निर्देश देने की एक लंबी परंपरा रही है, और यह केवल खाने के तेल से शुरू नहीं हुई थी, बल्कि भोजन से ही इसकी शुरुआत हुई थी।

सूत्र ने कहा, ‘‘1950 के दशक की शुरुआत में भारत गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहा था और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से अपनी खान-पान की आदतों में मूलभूत बदलाव करने की सार्वजनिक अपील की थी। यह राष्ट्रीय चुनौती से निपटने का कांग्रेस का तरीका था—अधिक त्याग करो, कम पाओ और उसके लिए आभारी रहो।’’

उन्होंने कहा कि कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी की पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की अपील को आर्थिक कमजोरी के सबूत के तौर पर पेश करना पसंद करती है, लेकिन मनमोहन सिंह के बयान को भूल जाती है।

सिंह ने कहा था, ‘‘विश्व स्तर पर ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं; हमने आपको बचाने की पूरी कोशिश की है। हालांकि, ईंधन पर सब्सिडी बहुत ज़्यादा है, और सब्सिडी का बिल दो लाख करोड़ रुपये से भी ज़्यादा हो सकता है। इसके लिए पैसा कहां से आएगा? पैसा पेड़ों पर नहीं उगता।’’ सूत्रों के अनुसार, सिंह की यह अपील आर्थिक हताशा से उपजी थी, क्योंकि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार सार्वजनिक वित्त प्रबंधन में विफल रही थी।

सूत्रों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने दशकों तक वास्तविक आर्थिक संकट की स्थिति में शासन किया और इसके जवाब में उसने ‘‘दबाव, प्रतिबंध और निराशाजनक अपील’’ का सहारा लिया तथा नागरिकों से आभूषण दान करने, मुख्य खाद्यान्न छोड़ने और सोमवार को उपवास रखने तक की अपील की।

एक सूत्र ने कहा, ‘‘स्वर्ण स्वामित्व को अपराध घोषित करने वाला स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम, चिदंबरम की चार अपील, मनमोहन सिंह का यह बयान कि पैसा पेड़ों पर नहीं उगता, कभी भी राष्ट्रीय महानता के क्षण नहीं थे बल्कि आर्थिक कमजोरी और शासन की विफलता की स्वीकारोक्ति थे।’’

प्रधानमंत्री मोदी की टिप्पणियों की आलोचना करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि ये ‘‘विफलता का सबूत’’ हैं। राहुल गांधी ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में देश ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि अब जनता को यह बताना पड़ रहा है कि क्या खरीदना है और क्या नहीं, कहां जाना है और कहां नहीं जाना है।

भाषा आशीष माधव

माधव


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