कांग्रेस ने सबसे पहले 1925 में यूसीसी की मांग की थी, अब वह एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है: शर्मा

कांग्रेस ने सबसे पहले 1925 में यूसीसी की मांग की थी, अब वह एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है: शर्मा

कांग्रेस ने सबसे पहले 1925 में यूसीसी की मांग की थी, अब वह एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है: शर्मा
Modified Date: May 27, 2026 / 03:59 pm IST
Published Date: May 27, 2026 3:59 pm IST

गुवाहाटी, 27 मई (भाषा) कांग्रेस को वर्ष 1925 में सबसे पहले समान नागरिक संहिता की वकालत करने वाली पार्टी बताते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बुधवार को आरोप लगाया कि विपक्षी दल अब धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा और एक विशेष समुदाय का प्रतिनिधि बन गया है।

‘समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक’ पर चर्चा के दौरान सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित कानून विपक्ष के भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा पर नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 44 की नींव पर आधारित है।

शर्मा ने कहा, “समान नागरिक संहिता का लंबा इतिहास है। इसकी मांग सबसे पहले कांग्रेस ने 1925 में की थी। 1937 में जवाहरलाल नेहरू ने भी इसका सुझाव दिया था। वही कांग्रेस आज इसका विरोध कुरान और शरीयत के नजरिए से कर रही है, न कि हिंदू, ईसाई या आदिवासी दृष्टिकोण से।”

उन्होंने यह भी कहा, “कांग्रेस समान नागरिक संहिता का विरोध कर रही है। विधानसभा में उसकी संरचना यह साबित करती है कि वह सभी जातियों, पंथों और धर्मों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि केवल एक विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है। कांग्रेस असम की भौगोलिक विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं करती।”

असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 19 विधायक हैं, जिनमें 18 मुस्लिम समुदाय से और एक हिंदू समुदाय से हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा, “आज की कांग्रेस को देखकर बहुत दुख और पीड़ा होती है। हमारे वक्तव्यों में सभी धर्मों और सभी लोगों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। मुझे लगता है कि कांग्रेस को सांप्रदायिक पार्टी में बदलने के बजाय भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपरा का पालन करना चाहिए।”

गोवा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब वर्ष 1961 में यह तटीय राज्य भारत में शामिल हुआ, तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पुर्तगाली समान नागरिक संहिता को जारी रखा और इस तरह गोवा ऐसा कानून लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना था।

पश्चिमी राज्य ने 1961 में भारतीय संघ में विलय के समय अपने मौजूदा पारिवारिक कानून — 1867 की पुर्तगाली नागरिक संहिता — को बरकरार रखा और बाद में उसका नाम गोवा नागरिक संहिता कर दिया।

शर्मा ने कहा, “उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम समान नागरिक संहिता लागू करने वाला भारत का तीसरा राज्य बनेगा। यह लैंगिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 इस विधेयक की नींव है।”

उन्होंने प्रस्तावित कानून के दायरे से आदिवासी समुदायों को बाहर रखने का बचाव करते हुए कहा कि ऐसे व्यक्तिगत मामलों में उनके पास पहले से ही लंबे समय से चली आ रही कई पारंपरिक व्यवस्थाएं और रीति-रिवाज मौजूद हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा, “आदिवासी समुदाय बहुविवाह का समर्थन नहीं करते, लड़कियों को समान अधिकार देते हैं और लिव-इन संबंधों को मान्यता नहीं देते। एक तरह से वे लंबे समय से समान नागरिक संहिता जैसी व्यवस्था लागू करते आ रहे हैं। आत्म-नियमन ही सबसे अच्छा नियमन है। इसलिए हम इसे आदिवासियों पर थोपना नहीं चाहते।”

धर्म से परे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून लागू करने के उद्देश्य से असम सरकार ने सोमवार को समान नागरिक संहिता विधेयक विधानसभा में पेश किया। इस विधेयक में बहुविवाह पर रोक लगाने और लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया है।

विधेयक में कहा गया है कि यह कानून असम में रहने वाली किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा। इसमें कई दंडात्मक प्रावधान भी प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें द्विविवाह या बहुविवाह के लिए सात वर्ष तक की कैद और लिव-इन संबंध का पंजीकरण नहीं कराने पर तीन महीने तक की जेल की सजा शामिल है।

भाषा रंजन मनीषा

मनीषा


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