पश्चिम बंगाल के वन विभाग के निर्देशों पर विवाद, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पश्चिम बंगाल के वन विभाग के निर्देशों पर विवाद, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 13 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल के वन विभाग ने महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं के लिए वन एवं वन्यजीव मंजूरी देने में होने वाली देरी को कम करने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं।
नौ जून को जारी एक कार्यालय ज्ञापन के अनुसार ये निर्देश एक प्रमुख “अड़चन” को दूर करने के लिए हैं, जो मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों द्वारा परियोजना प्रस्तावकों से बार-बार और टुकड़ों में ‘आवश्यक विवरण’ (एसेंशियल-डिटेल्स-सॉट) मांगे जाने के कारण पैदा होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन निर्देशों से प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ), नोडल अधिकारी और वन्यजीव वार्डन की शक्तियां सीमित हो सकती हैं तथा उन्हें परियोजनाओं की विस्तृत जांच के बिना ही मंजूरी देने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
आदेश के अनुसार, डीएफओ या वन्यजीव वार्डन किसी भी परियोजना प्रस्तावक से उच्च प्रशासनिक मंजूरी के बिना सीधे ईडीएस नहीं मांग सकेंगे।
एसेंशियल-डिटेल्स-सॉट (ईडीएस) एक आधिकारिक प्रश्न होता है, जिसके माध्यम से किसी परियोजना के पर्यावरणीय मंजूरी से पहले आवश्यक दस्तावेज, स्पष्टीकरण या आंकड़े मांगे जाते हैं।
वन विभाग की ओर से जारी आदेश में राज्य स्तरीय समीक्षा बोर्ड के गठन का भी प्रावधान किया गया है, जिसकी अध्यक्षता वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव करेंगे और यह प्रत्येक महीने ईडीएस से जुड़े मामलों की समीक्षा करेगा।
यदि किसी परियोजना पर एक से अधिक बार ईडीएस जारी किया गया है, तो उस आवेदन को स्वतः बोर्ड की बैठक में शामिल किया जाएगा।
इसके अलावा, बार-बार पूछताछ होने की स्थिति में संबंधित नोडल अधिकारी, मुख्य वन्यजीव वार्डन (सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू) और डीएफओ को बोर्ड के समक्ष मौजूद होकर अपनी कार्रवाई की तकनीकी और कानूनी आवश्यकता को स्पष्ट करना होगा।
‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ के जलवायु एवं पारिस्थितिकी टीम प्रमुख देवादित्य सिन्हा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि बोर्ड के समक्ष अधिकारियों की मौजूदगी उन्हें दबाव में ला सकती है।
सिन्हा ने कहा, ‘‘एक अच्छा अधिकारी वही है जो परियोजना प्रस्ताव पर अधिक सवाल पूछे। इससे मंजूरी में देरी हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अधिकारी को आलोचना के लिए डराया जाए।’’
उन्होंने यह भी कहा कि ईडीएस के संबंध में टिप्पणियों के लिए ‘परिवेश पोर्टल’ पर पहले से ही व्यवस्था मौजूद है, इसलिए बोर्ड के समक्ष उपस्थिति आवश्यक नहीं है।
आदेश में राज्य तकनीकी स्क्रीनिंग सेल (एसटीएससी) के गठन का भी प्रावधान है, जो नोडल अधिकारी और मुख्य वन्यजीव वार्डन के प्रतिनिधि के अधीन कार्य करेगा।
एसटीएससी को किसी भी आवेदन को डिजिटल प्रक्रिया में भेजने से पहले 48 घंटे के भीतर आधारभूत आंकड़ों की जांच करनी होगी।
आधारभूत डेटा में जल, मिट्टी और वायु गुणवत्ता जैसे पहलू शामिल होते हैं, जो किसी परियोजना से पहले की पर्यावरणीय स्थिति को दर्शाते हैं।
भारतीय वन सेवा (आईएफएस) की पूर्व अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव ने कहा कि 48 घंटे की समयसीमा स्पष्ट नहीं है।
श्रीवास्तव ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह समय अंतिम अनुपालन दस्तावेजों की जांच के लिए है या आधारभूत डेटा एकत्र करने के लिए।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि इसे तुरंत डेटा संग्रह के रूप में लिया गया, तो यह समस्या पैदा कर सकता है। ऐसी अस्पष्टता का इस्तेमाल अक्सर मंजूरी प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया जा सकता है।’’
आदेश में यह भी कहा गया है कि आवेदन के पंजीकरण के 10 कार्य दिवसों के भीतर डीएफओ और संबंधित वन्यजीव प्रबंधक को एक संयुक्त स्थल निरीक्षण करना होगा।
इस निरीक्षण में राजस्व अधिकारी, वन विभाग और परियोजना प्रस्तावक भी शामिल होंगे।
देवादित्य सिन्हा ने कहा कि 10 दिनों के भीतर एक ही निरीक्षण करना अधिकारियों पर अत्यधिक दबाव डालेगा।
प्रकृति श्रीवास्तव ने कहा कि ये निर्देश वन संरक्षण की तुलना में मंजूरी प्रक्रिया को प्राथमिकता देते प्रतीत होते हैं।
भाषा रवि कांत रवि कांत माधव
माधव

Facebook


