अदालत ने पड़ोसियों को बैठकर नारियल पेड़ विवाद सुलझाने की सलाह दी

अदालत ने पड़ोसियों को बैठकर नारियल पेड़ विवाद सुलझाने की सलाह दी

अदालत ने पड़ोसियों को बैठकर नारियल पेड़ विवाद सुलझाने की सलाह दी
Modified Date: June 23, 2026 / 03:33 pm IST
Published Date: June 23, 2026 3:33 pm IST

कोच्चि, 23 जून (भाषा) केरल उच्च न्यायालय में एक साधारण नारियल का पेड़ एक अनोखी कानूनी लड़ाई का केंद्र बन गया, जिस पर सुनवाई करते हुए एक न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि उस पेड़ में हंसने की क्षमता होती, तो वह संभवतः उसको लेकर झगड़ रहे पड़ोसियों पर हंसता।

न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन ने पेड़ से खतरा होने की आशंका को लेकर दायर एक रिट याचिका खारिज करते हुए दोनों पड़ोसियों से अपने मतभेद भुलाकर ‘‘एक कप चाय या कॉफी’’ पर साथ बैठक कर विवाद सुलझाने का आग्रह किया।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता और नौवें प्रतिवादी के बीच इस नारियल के पेड़ को लेकर लड़ाई जारी है। यदि नारियल के पेड़ में हंसने की क्षमता होती, तो वह झगड़ रहे इन पड़ोसियों पर अवश्य हंसता।’’

यह मामला तिरुवनंतपुरम जिले के कराकुलम गांव स्थित दो पड़ोसी संपत्ति मालिकों से जुड़ा है। न्यायमूर्ति कुन्हीकृष्णन ने 18 जून के अपने आदेश में इस मुकदमेबाजी को ‘‘पड़ोस के एक मामूली विवाद से उत्पन्न अनावश्यक मुकदमेबाजी का एक उदाहरण’’ बताया।

उन्होंने कहा कि जिस मामले का समाधान ‘‘एक कप चाय या कॉफी के साथ बैठकर’’ हो जाना चाहिए था, वह अब ‘‘पूर्ण विकसित कानूनी लड़ाई’’ में बदल गया है।

फैसले में कहा गया, ‘‘कानून बुनियादी पड़ोसी सद्भावना का विकल्प नहीं बन सकता।’’

अदालत ने पक्षकारों को यह भी याद दिलाया कि पड़ोसियों को ‘‘आपसी विश्वास और सहयोग’’ के साथ रहना चाहिए।

एक असामान्य पहल करते हुए न्यायाधीश ने बाइबिल का उद्धरण दिया, जिसमें कहा गया है, ‘‘अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे स्वयं से करते हो।’’

उन्होंने दोनों पक्षों से इस पर अमल करने और ‘‘चाय या कॉफी पर बैठकर विवाद सुलझाने’’ का आग्रह किया।

अदालत ने पाया कि पंचायत की रिपोर्ट, लोकायुक्त के निर्देशों और एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट के आलोक में इस नारियल के पेड़ से ‘‘बिल्कुल भी कोई खतरा’’ नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि केरल पंचायत राज अधिनियम की धारा 238 के तहत कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह प्रावधान तभी लागू होता है जब किसी पेड़ के गिरने से लोगों या संपत्ति को खतरा होने की आशंका हो।

यद्यपि अदालत ने कहा कि न्यायिक समय बर्बाद करने के लिए दोनों पक्षों पर जुर्माना लगाना उचित होता, लेकिन उसने ऐसा नहीं करने का निर्णय लिया।

यह विवाद पहले ही स्थानीय पंचायत, राजस्व अधिकारियों तथा स्थानीय स्वशासन संस्थानों के लोकायुक्तों तक पहुंच चुका था।

उच्च न्यायालय ने स्थल निरीक्षण के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर भी नियुक्त किया था, जिसके पारिश्रमिक के रूप में याचिकाकर्ता ने एक लाख रुपये का भुगतान किया। एडवोकेट कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नारियल का पेड़ मजबूत जड़ों वाला है और उसके गिरने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है।

इसके बावजूद याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं हुआ और उसने अपने दावे के समर्थन में अदालत के समक्ष वीडियो भी प्रस्तुत किए।

भाषा अमित प्रशांत

प्रशांत


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