ईसाई धर्म को एकमात्र सच्चा धर्म बताने वाले पादरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक

ईसाई धर्म को एकमात्र सच्चा धर्म बताने वाले पादरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक

ईसाई धर्म को एकमात्र सच्चा धर्म बताने वाले पादरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक
Modified Date: April 10, 2026 / 02:11 pm IST
Published Date: April 10, 2026 2:11 pm IST

नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने ईसाई धर्म को ही एकमात्र सच्चा धर्म बताने वाले पादरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और समन पर शुक्रवार को रोक लगा दी।

न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का अनुरोध करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 18 मार्च के आदेश को चुनौती दी थी।

पादरी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295ए लगाई है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर किए गए और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है।

पीठ ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब का अनुरोध करने वाली याचिका पर नोटिस जारी कर रही है।

दवे ने पादरी के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही और समन पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

पीठ ने अनुरोध स्वीकार कर कार्यवाही पर रोक लगा दी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 18 मार्च को फादर परेरा की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में किसी धर्म विशेष को ‘‘एकमात्र सच्चा धर्म’’ बताना गलत है और यह अन्य धर्मों का अपमान करने के बराबर हो सकता है, जिससे कानून के प्रावधान लागू होते हैं।

उच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह के बयान प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 295ए के दायरे में आते हैं, जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर किए गए और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है।

आदेश में कहा गया है, ‘‘किसी भी धर्म के लिए यह दावा करना गलत है कि वह एकमात्र सच्चा धर्म है क्योंकि इससे अन्य धर्मों का अपमान होता है।’’

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी के अनुसार याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर प्रार्थना सभाएं आयोजित कीं जहां उन्होंने बार-बार कहा कि ईसाई धर्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है जिससे दूसरे समुदाय के सदस्यों की भावनाओं को ठेस पहुंची।

पड़ताल के दौरान जांच अधिकारी को अवैध रूप से धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं मिला लेकिन उन्होंने अन्य धर्मों की आलोचना करने के आरोपों पर आरोपपत्र दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

फादर परेरा के वकील ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह दलील दी कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया और आईपीसी की धारा 295ए के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।

उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का उचित इस्तेमाल किए बिना आरोपपत्र पर संज्ञान लिया।

भाषा सुरभि वैभव

वैभव


लेखक के बारे में