सरकार की आलोचना का मतलब भारत के प्रति असंतोष से नहीं है: संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा

सरकार की आलोचना का मतलब भारत के प्रति असंतोष से नहीं है: संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा

सरकार की आलोचना का मतलब भारत के प्रति असंतोष से नहीं है: संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा
Modified Date: February 19, 2026 / 08:23 pm IST
Published Date: February 19, 2026 8:23 pm IST

नयी दिल्ली, 19 फरवरी (भाषा) प्रेस की स्वतंत्रता की बात करने वाले संगठन ‘फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स’ ने बृहस्पतिवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि सरकार की ऐसी आलोचना लोकतंत्र में पूरी तरह से अनुमत है जिससे हिंसा न भड़के और इसे ‘‘भारत के खिलाफ असंतोष’’ नहीं माना जा सकता और इस पर यूएपीए लागू करना जायज नहीं ठहराया जा सकता।

उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू की।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार उपस्थित हुए और उन्होंने तर्क दिया कि यूएपीए में ‘‘असंतोष’’ की ‘‘अस्पष्ट’’ प्रकृति नागरिकों, विशेष रूप से पत्रकारों को ‘‘अनिश्चितता के अथाह सागर’’ में धकेल देती है और इसलिए यह मनमाना है।

दातार ने कहा, ‘‘पत्रकारों के तौर पर हम विशेष रूप से चिंतित हैं… दरअसल, हमारे मामलों में किसी विशेष नीति की आलोचना करने वाले पत्रकारीय लेखों के कारण लोगों को जेल जाना पड़ा है, और हमारे पास जेल में बंद पत्रकारों की पूरी सूची है। कुछ को जमानत पर रिहा कर दिया गया है, लेकिन कुछ अब भी जेल में बंद हैं… नीतियों की आलोचना करने के लिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसका मूल कारण यह है कि एक पत्रकार को लगातार यह डर सताता रहता है कि किसी भी प्रकार की आलोचना भारत के प्रति असंतोष का प्रतीक बन जाएगी। मैं खनन नीति की आलोचना कर सकता हूं। मैं किसी विशेष नीति की आलोचना कर सकता हूं। इससे भारत की छवि खराब हो सकती है। लेकिन जब तक वे हिंसा नहीं भड़का रही या हिंसा को बढ़ावा नहीं दे रही हैं, तब तक यह गैरकानूनी नहीं है। यही लोकतंत्र है।’’

संविधान के तहत नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए, दातार ने कहा कि ‘‘असंतोष’’, जो ‘‘अपरिभाषित’’, ‘‘अस्पष्ट’’ और ‘‘बिना किसी सीमा के’’ है, का ‘‘सबसे घोर’’ दुरुपयोग किया जा सकता है।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 मार्च की तारीख निर्धारित की।

इन याचिकाओं में यूएपीए के तहत गिरफ्तारी और सीमित जमानत के प्रावधानों को भी चुनौती दी गई है।

भाषा नेत्रपाल वैभव

वैभव


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