मौजूदा व्यवस्था की आलोचना को निंदा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए : न्यायमूर्ति मनमोहन

मौजूदा व्यवस्था की आलोचना को निंदा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए : न्यायमूर्ति मनमोहन

मौजूदा व्यवस्था की आलोचना को निंदा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए : न्यायमूर्ति मनमोहन
Modified Date: April 18, 2026 / 04:25 pm IST
Published Date: April 18, 2026 4:25 pm IST

नयी दिल्ली, 18 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनमोहन ने शनिवार को कहा कि मौजूदा व्यवस्था की किसी भी आलोचना को उसकी निंदा नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि उसे सुझाव के रूप में देखा जाना चाहिए।

वह ‘सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स’ (एसआईएलएफ) और ‘सोसाइटी ऑफ लीगल प्रोफेशनल्स’ (एसआईएलपी) द्वारा आयोजित एक विधिक सम्मेलन और पुरस्कार समारोह को संबोधित रहे थे। कार्यक्रम का विषय था- ‘सभी के लिए न्याय : सुलभ और किफायती’।

उन्होंने कहा, ‘‘पिछली बार मैंने व्यवस्था में सुधार की बात की थी, लेकिन कुछ लोगों ने मेरे वक्तव्य को गलत समझ लिया, मानो वह व्यवस्था की निंदा हो। जब आप व्यवस्था में सुधार की बात करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उन समस्याओं की भी चर्चा करनी पड़ती है जो उसमें उत्पन्न होती हैं।’’

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जब आप व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं, तो वह केवल सुधार के लिए होता है, न कि उसकी निंदा के लिए। इसलिए इसे व्यवस्था की निंदा नहीं माना जाना चाहिए और न ही इसे वे लोग हथियार बनाएं जो अपने हित साधना चाहते हैं।’’

न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्याओं से निपटने का उचित तरीका होना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ वर्ष पहले मेरे समक्ष एक मामला आया था, जिसका मैंने फैसला किया था। वह एक फिल्म निर्माता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से जुड़ा था। यह प्राथमिकी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज की गई थी। आरोप था कि फिल्म में जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई को विस्तार से दिखाया गया है, इसलिए निर्माता पर मुकदमा चलाया जाए।’’

उन्होंने कहा कि उन्होंने प्राथमिकी रद्द कर दी, क्योंकि यह कहने का अच्छा अवसर था कि यदि कोई फिल्म किसी सामाजिक प्रथा को बुराई बताना चाहती है, तो उसे उस प्रथा को दिखाना ही पड़ेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘अन्यथा जनता उसे कैसे समझेगी? इसलिए जब हम व्यवस्था की समस्याओं की बात करते हैं और सुधार चाहते हैं, तो यह व्यवस्था की निंदा नहीं है। यह केवल यह बताना है कि व्यवस्था में कुछ सुधारों की जरूरत है। कमियों को दूर कर व्यवस्था को उच्च स्तर पर ले जाना ही उद्देश्य है।’’

न्यायमूर्ति मनमोहन ने दोहराया, ‘‘आलोचना को निंदा नहीं, बल्कि सुझाव माना जाना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि विधि कंपनियों को कानूनी शिक्षा के मुद्दों पर संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए।

प्रौद्योगिकी की भूमिका पर उन्होंने कहा कि यह हमेशा दोधारी तलवार रही है।

न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा, ‘‘कोई यह नहीं कह रहा कि पूरी निर्णय प्रक्रिया तकनीक को सौंप दी जाए। तकनीक मानव नियंत्रण में रहनी चाहिए। हमें इसे सहायक साधन के रूप में देखना चाहिए।’’

उन्होंने लंबित मामलों के मुद्दे पर भी चिंता जताई और कहा कि इसे कम करने के लिए सभी उपलब्ध उपाय अपनाए जाने चाहिए।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कानूनी समुदाय को इस पर विचार करना चाहिए कि जो मध्यस्थता प्रणाली समस्या का समाधान मानी गई थी, क्या वह खुद समस्या बन गई है? और क्या यह केवल इसलिए हुआ है क्योंकि हम मध्यस्थता की कार्यवाही उसी तरह चला रहे हैं जैसे अदालतों में होती है?’’

भाषा गोला रंजन

रंजन


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