दिल्ली : यमुना बाजार में ध्वस्तीकरण के बाद परिवारों के ऊपर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादल
दिल्ली : यमुना बाजार में ध्वस्तीकरण के बाद परिवारों के ऊपर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादल
(तस्वीरों के साथ)
(वर्षा सागी)
नयी दिल्ली, 25 जून (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी के यमुना बाजार में बृहस्पतिवार को प्रशासन जब अतिक्रमण हटाने बुलडोजर के साथ पहुंचा तो पीढ़ियों से यहां रहकर यमुना नदी में नाव चलाकर आजीविका कमाने वाले परिवार अंधकारमय भविष्य की आशंका के साथ निराशा के दरिया में गोते लगाते दिखाई दिये।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने यमुना बाजार इलाके में ध्वस्तीकरण कार्रवाई की। इससे पहले, उन्होंने घाट संख्या-2 और 32 के बीच बसी बस्तियों के निवासियों को नोटिस जारी करके यमुना के संरक्षित बाढ़ संभावित क्षेत्र को खाली करने के लिए कहा था।
कार्रवाई शुरू होने से पहले यहां के निवासी अपनी गृहस्थी को पीठ पर लादे, अनिश्चित भविष्य के साथ नजदीक ही बने आश्रय गृह की ओर कूच करते नजर आए। बेघर हो चुके लोग बस यही कह पा रहे थे, ‘‘अदालत ने अधिकारियों से हमारी बात सुनने को कहा है, लेकिन वे सुन नहीं रहे हैं…।’’
सुधाकर कुमार निषादराज ने कहा, ‘‘मैं सुबह छह बजे से यहीं बैठा हूं और बस देख रहा हूं।’’
निषादराज घाट संख्या- 9 के पास नाव चलाते हैं। वह उन लोगों और तीर्थयात्रियों को यमुना में ले जाते हैं जो अपने प्रियजनों की अस्थियां नदी में विसर्जित करने के लिए आते हैं।
उन्होंने निराशा के भाव से यमुना को एकटक निहारते हुए कहा, ‘‘दो दिन पहले अधिकारी आए और हमसे कहा कि 25 जून तक सब कुछ हटाना होगा। हमें इसका अंदाजा था। लेकिन अब हम कहां जाएं?’’
निषादराज ने कहा कि इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से करीब 100 परिवार प्रभावित हुए हैं, जिनकी ज़िंदगी यमुना में नौका सेवा और धार्मिक रीति-रिवाजों पर निर्भर थी। इनमें आठ-नौ ऐसे परिवार भी शामिल हैं जो पीढ़ियों से अपनी आजीविका के लिए नदी पर निर्भर रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरा परिवार मेरे दादा के भी दादा के समय से यह काम कर रहा है। हमारे पास ऐसे दस्तावेज हैं जिनसे पता चलता है कि हम लगभग 150 सालों से यह काम कर रहे हैं। हम निषाद समुदाय से हैं। रामायण में निषादराज ने भगवान राम, सीता और लक्ष्मण को नदी पार करने में मदद की थी। हम खुद को उसी वंश का मानते हैं और यह नदी ही हमारी जिंदगी रही है।’’
निषादराज ने बताया कि नौका और धार्मिक अनुष्ठानों के अलावा वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए यमुना किनारे जमीन के एक छोटे से हिस्से पर खेती भी करते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है। मेरे तीन बच्चे हैं। मेरी बेटी और बड़ा बेटा कॉलेज के पहले साल में हैं और छोटा बेटा 12वीं कक्षा में है। मुझे नहीं पता कि मैं उनकी फीस कैसे भरूंगा या अपने परिवार का गुजारा कैसे करूंगा। हो सकता है कि हमें वज़ीराबाद जाना पड़े, लेकिन वहां किराया बहुत ज्यादा है और अब मेरी कोई कमाई भी नहीं है।’’
उन्होंने अपनी नाव की ओर इशारा करते हुए कहा कि बस यही बची है। ‘‘अगर ध्वस्तीकरण के दौरान मलबा नदी में गिरा, तो मेरी नाव को भी नुकसान पहुंच सकता है। मेरे पास बस यही नाव है।’’
एक अन्य नौका चालक ने दावा किया कि उसका परिवार लगभग 200 सालों से यमुना के किनारे रह रहा है और काम कर रहा है।
उन्होंने याद किया कि कुछ समय पहले ही, एक युवती ने आत्महत्या की कोशिश में यमुना नदी में छलांग लगा दी थी और स्थानीय नाविकों ने नदी में कूदकर उसे बचा लिया था।
एक और निवासी, राजेश ने भी कहा कि ध्वस्तीकरण की वजह से उनके परिवार की कमाई का कोई जरिया नहीं बचा है।
भाषा धीरज वैभव
वैभव

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