दोहरी हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समयपूर्व रिहाई दी

दोहरी हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समयपूर्व रिहाई दी

दोहरी हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समयपूर्व रिहाई दी
Modified Date: August 31, 2026 / 08:30 pm IST
Published Date: August 31, 2026 8:30 pm IST

नयी दिल्ली, 31 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने दोहरी हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक दोषी को 20 साल जेल में बिताने के बाद सोमवार को समयपूर्व रिहाई दे दी।

न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने कहा कि उनका फैसला ऋग्वेद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और दंडशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों में प्रतिपादित दर्शन पर आधारित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाज में शांति के व्यापक उद्देश्यों के लिए अपराधियों में सुधार लाना, उन्हें निवारण या प्रतिशोधात्मक दंड देने की तुलना में अधिक प्रभावी है।

दोषी ने सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) के 2025 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज कर दी गई थी। दोषी ने दिसंबर 2004 में दो लोगों की चाकू मारकर हत्या कर दी थी और उनका सामान लूट लिया था।

निचली अदालत ने 2010 में उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

राज्य की इस आपत्ति को खारिज करते हुए कि याचिकाकर्ता ने ‘जघन्य’ अपराध किया था, न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि घटना के समय उसकी उम्र 19 वर्ष थी और अब तक मृतकों के परिजनों को पहुंचा घाव काफी हद तक भर चुका होगा।

अदालत ने कहा कि दोषी ने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली है और उसकी ‘सामाजिक जांच रिपोर्ट’ में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि वह अपने समुदाय और परिवार में पूरी तरह दोबारा शामिल होने तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिरता और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

अदालत ने इस पर भी गौर किया कि दोषी आदतन या पेशेवर अपराधी नहीं था, जो उसके सुधार की संभावना और समयपूर्व रिहाई देने के फैसले में महत्वपूर्ण पहलू था।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘निस्संदेह, हत्या के बाद चोरी करना गंभीर अपराध है। लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह अपराध वर्ष 2004 में हुआ था और निचली अदालत ने तर्कसंगत आदेश के जरिए इसे मृत्युदंड देने योग्य मामला नहीं माना था, इसलिए उम्रकैद की सजा दी गई।’

अदालत ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता 20 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। ऐसा नहीं है कि समय बीतने के कारण अपराध की मूल गंभीरता किसी भी तरह कम हो जाती है, लेकिन सार्थक दंड व्यवस्था के लिए याचिकाकर्ता द्वारा भुगती गई इतनी लंबी कैद को देखते हुए अपराध की गंभीरता को बदले हुए परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।’’

अदालत ने कहा कि दोषी को अब जेल से बाहर आने का अवसर मिलना चाहिए, बजाय इसके कि वह आगे भी ‘अनावश्यक कैद’ झेले।

उच्च न्यायालय ने कहा कि एसआरबी द्वारा समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज करने का फैसला कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि इसमें उचित विचार-विमर्श नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि प्राधिकारियों ने महत्वपूर्ण परिस्थितियों को नजरअंदाज किया और उनका रवैया ‘अपराध भय’ से प्रभावित प्रतीत होता है।

अदालत ने मामले को दोबारा विचार के लिए एसआरबी के पास भेजने से भी इनकार कर दिया। उसने कहा कि दोषी की समयपूर्व रिहाई के मुद्दे पर प्राधिकारियों ने बार-बार अवैज्ञानिक और लापरवाह तरीके से विचार किया।

भाषा अमित माधव अविनाश

अविनाश


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