दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूट्यूबर को अवमानना का दोषी ठहराया
दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूट्यूबर को अवमानना का दोषी ठहराया
नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक यूट्यूबर को उन वीडियो के लिए अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया है, जिनमें कुछ न्यायिक अधिकारियों पर ‘व्यक्तिगत हमले’ किए गए थे और न्यायिक प्रणाली की गरिमा को कमतर किया गया था।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और रविंदर दुदेजा की पीठ ने कहा कि गुलशन पाहुजा के चैनल ‘फाइट चार ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स’ पर मौजूद वीडियो का विषयवस्तु संविधान के तहत ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के रूप में संरक्षित नहीं है और उन्हें सजा के मुद्दे पर दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
पीठ ने 21 अप्रैल को दिए गए फैसले में कहा कि असंतुष्ट वादी कभी-कभी “अनुचित टिप्पणियां” कर अपनी निराशा जाहिर कर सकता है, जिन्हें “नजरअंदाज” किया जा सकता है, लेकिन इस मामले में पाहुजा ने अपनी नाराजगी को निष्पक्ष आलोचना के रूप में व्यक्त नहीं किया, बल्कि उनका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों और न्यायपालिका की छवि को धूमिल करना था।
अदालत ने कहा, “उन्होंने तीन न्यायिक अधिकारियों पर व्यक्तिगत हमले किए और यहां तक आरोप लगाया कि यदि किसी वादी का मामला उनके (संबंधित न्यायिक अधिकारी) समक्ष सूचीबद्ध हो, तो उसे न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ ऐसे व्यापक आरोपों का आधार क्या है?… प्रतिवादी संख्या दो ने बिना किसी आधार के संबंधित न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ फैसला सुना दिया और उनकी गरिमा को भंग किया। यह उनके द्वारा आपराधिक अवमानना करने का एक स्पष्ट मामला है।”
अदालत ने कहा कि पाहुजा द्वारा पिछले वर्ष सात मार्च को यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो का बैनर और परिचय, भले ही उच्चतम न्यायालय को लक्ष्य बनाकर तैयार किया गया था, लेकिन उसका वास्तविक प्रभाव पूरे न्यायिक तंत्र की गरिमा को भंग करने वाला था।
अदालत ने कहा, “यह केवल उच्चतम न्यायालय के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के खिलाफ है। इसका उद्देश्य व्यवस्था का मजाक उड़ाना, उसे बदनाम करना और उसकी गरिमा को भंग करना है।”
अदालत ने कहा कि किसी भी न्यायिक अधिकारी से हर समय शत-प्रतिशत सही होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती और इसलिए वादी के पास उच्च अदालतों में अपील करने का विकल्प होता है।
अदालत ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी या क्षमता पर हमला ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए, क्योंकि निराधार आरोप उनकी गरिमा को भंग करते हैं और बिना किसी भय या पक्षपात के न्याय देने की प्रक्रिया में बाधा डालते हैं।
अदालत ने माना कि कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग को लेकर पाहुजा द्वारा चलाया गया अभियान अवमानना नहीं माना जा सकता।
अदालत ने वीडियो में शामिल दो वकीलों को बिना शर्त माफी मांगने के बाद आरोपों से मुक्त कर दिया।
भाषा
राखी माधव रंजन
रंजन

Facebook


