दिल्ली उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति मामले में पूर्व सैन्य अधिकारी की दोषसिद्धि रद्द की
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति मामले में पूर्व सैन्य अधिकारी की दोषसिद्धि रद्द की
नयी दिल्ली, दो जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने आय के ज्ञात स्रोतों के अनुपात में अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी की दोषसिद्धि रद्द कर दी और वर्ष 2016 में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक वर्ष की जेल की सजा को भी निरस्त कर दिया।
अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के एक भी मामले में दोषी को दंडित किए बिना नहीं छोड़ा जाना चाहिए, लेकिन दोषी ठहराने का फैसला जल्दबाजी या सतही तरीके से नहीं किया जा सकता।
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर सेवानिवृत्त मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर की अपील को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति जमशेद सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों से किसी व्यक्ति के सम्मान और प्रतिष्ठा पर लंबे समय तक असर पड़ता है और भारतीय सेना के किसी अधिकारी के मामले में इसके परिणाम और भी गंभीर होते हैं।
न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में न केवल अपीलकर्ता को उसके बचाव में साक्ष्य पेश करने का उचित और पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, बल्कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अधिकारियों की ओर से दी गई मंजूरी भी कानूनी रूप से वैध नहीं थी।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) यह साबित करने में विफल रहा कि उन्होंने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सीबीआई द्वारा वर्ष 2007 में प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद निचली अदालत ने सितंबर 2016 में अपीलकर्ता को दो करोड़ रुपये से अधिक की आय से अधिक संपत्ति रखने का दोषी पाया था और एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
अदालत ने आरोपी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था और अतिरिक्त संपत्तियां जब्त करने का निर्देश भी दिया था।
सीबीआई ने प्राथमिकी में आरोप लगाया था कि वर्ष 1971 में भारतीय सेना में शामिल हुए अपीलकर्ता ने 1971 से 2006 के बीच सेना में सेवा के दौरान अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी।
अपीलकर्ता वर्ष 2009 में सेवानिवृत्त हुए थे।
इस मामले में अपीलकर्ता की पत्नी को निचली अदालत ने बरी कर दिया था।
एक जुलाई के फैसले में न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि निचली अदालत ने इस मामले में बचाव पक्ष के बाकी गवाहों की गवाही पूरी करने के लिए अपीलकर्ता को उचित अवसर नहीं दिया, जो एक ‘जल्दबाजी वाला कदम’ था।
अदालत ने कहा, ‘भ्रष्टाचार दीमक की तरह होता है, जो भले ही हमेशा ऊपर से दिखाई न दे, लेकिन चुपचाप और लगातार देश की स्थिरता, ताकत और उसकी मूल संरचना को कमजोर करता रहता है… भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराने का फैसला जल्दबाजी या औपचारिक तरीके से नहीं किया जा सकता, बल्कि तभी किया जा सकता है जब अभियोजन पक्ष संदेह से परे जाकर अपना मामला साबित कर दे।’
अपीलकर्ता को राहत देते हुए अदालत ने कहा कि चाहे संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता। अदालत ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता की अचल संपत्तियां, निवेश और नकदी उनकी आय के साधनों के अनुपात में अधिक थीं।
अदालत ने यह भी कहा, ‘मेरा मानना है कि अभियोजन की मंजूरी कानून के अनुसार वैध नहीं थी, अपीलकर्ता को बचाव पक्ष के साक्ष्य पेश करने का उचित और पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि जांच अवधि के दौरान अपीलकर्ता ने अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की थी। इसलिए अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।”
भाषा जोहेब अविनाश
अविनाश

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