पहले भी सार्वजनिक हो चुके हैं निर्वाचन आयोग के सदस्यों के मतभेद

पहले भी सार्वजनिक हो चुके हैं निर्वाचन आयोग के सदस्यों के मतभेद

पहले भी सार्वजनिक हो चुके हैं निर्वाचन आयोग के सदस्यों के मतभेद
Modified Date: September 23, 2026 / 08:07 pm IST
Published Date: September 23, 2026 8:07 pm IST

नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) निर्वाचन आयुक्तों के बीच विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर मतभेद की जानकारी सामने आने के बाद ऐसे कुछ और पुराने मामले फिर से चर्चा में आ गए हैं, जब निर्वाचन आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग राय होने की बात सामने आई थी।

वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) एन. गोपालस्वामी ने साथी निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोप में पद से हटाने की सिफारिश की थी। हालांकि, सरकार ने यह सिफारिश स्वीकार नहीं की और बाद में चावला मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने।

इससे पहले, 1993 से 1995 के बीच तत्कालीन सीईसी दिवंगत टी.एन. शेषन और निर्वाचन आयुक्तों एम.एस. गिल तथा जी.वी. कृष्णमूर्ति के बीच भी तीखा मतभेद सामने आया था। शेषन ने बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग के गठन को अदालत में चुनौती दी थी, जिसके बाद इस मुद्दे पर लंबी कानूनी लड़ाई चली।

शेषन के कार्यकाल के बाद गिल कांग्रेस में शामिल हुए और केंद्र में मंत्री बने।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेताओं को दी गई ‘क्लीन चिट’ पर असहमति दर्ज कराई थी।

उन्होंने मांग की थी कि अंतिम प्रकाशित आदेश में इन असहमति वाली टिप्पणियों को भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए। हालांकि, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा की अध्यक्षता वाले आयोग ने उनकी मांग यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि निर्वाचन आयोग के कार्यकारी आदेशों में अंतिम फैसलों के साथ असहमति टिप्पणियां संलग्न करने का कोई प्रावधान नहीं है।

बाद में लवासा ने एशियाई विकास बैंक (एडीबी) में शामिल होने के लिए निर्वाचन आयोग के पद से इस्तीफा दे दिया था।

इसी तरह, मई 2021 में तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने मद्रास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के समक्ष निर्वाचन आयोग के बचाव में अलग-अलग हलफनामा दाखिल करने का प्रयास किया था।

ये टिप्पणियां मद्रास उच्च न्यायालय ने की थीं, जिसमें उसने कहा था कि विधानसभा चुनावों के संचालन के तरीके के कारण कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के लिए निर्वाचन आयोग ‘‘पूरी तरह जिम्मेदार’’ था।

तत्कालीन सीईसी सुशील चंद्रा, कुमार द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे के पक्ष में नहीं थे। दोनों के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए थे और यह मामला सुर्खियों में आया था।

निर्वाचन आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मौजूदा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची के जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने समेत विभिन्न मुद्दों पर चिंता जताई है।

भाषा हक नरेश प्रशांत

प्रशांत


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