बंगाल में भाजपा के मत प्रतिशत में आठ फीसदी की वृद्धि से पार्टी ने पिछले चुनाव के मुकाबले 130 सीटें ज्यादा जीतीं : विश्लेषक

बंगाल में भाजपा के मत प्रतिशत में आठ फीसदी की वृद्धि से पार्टी ने पिछले चुनाव के मुकाबले 130 सीटें ज्यादा जीतीं : विश्लेषक

बंगाल में भाजपा के मत प्रतिशत में आठ फीसदी की वृद्धि से पार्टी ने पिछले चुनाव के मुकाबले 130 सीटें ज्यादा जीतीं : विश्लेषक
Modified Date: May 5, 2026 / 07:38 pm IST
Published Date: May 5, 2026 7:38 pm IST

कोलकाता, पांच मई (भाषा) पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मत-प्रतिशत में लगभग आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे पार्टी को इस बार राज्य में अतिरिक्त 130 सीट हासिल करने में मदद मिली तथा तृणमूल कांग्रेस को राज्य में भारी हार का सामना करना पड़ा। निर्वाचन आयोग के आंकड़े यह कहानी बयां कर रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि मत-प्रतिशत में इस स्तर की वृद्धि तभी संभव हो सकी है जब हिंदू एकजुट हुए, साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय के मतों में भी कुछ हद तक बिखराव देखने को मिला।

मतदान आंकड़ों की शुरुआती व्याख्या यह भी बताती है कि जिन सीट पर मतदान 85 प्रतिशत से अधिक था, वहां भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की, जबकि जिन सीट पर 95 प्रतिशत या उससे अधिक मतदान हुआ, वहां दोनों प्रमुख दलों का प्रदर्शन लगभग बराबर रहा।

आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा को इस बार 45.84 प्रतिशत वोट मिले, जो 2021 के मुकाबले 7.87 प्रतिशत अधिक हैं। उस वक्त भाजपा को 37.97 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बढ़ोतरी के चलते पार्टी ने विधानसभा में 207 सीट हासिल कीं, जबकि पिछली बार उसे केवल 77 सीट मिली थीं।

तृणमूल कांग्रेस के नजरिये से, उसका मत प्रतिशत 2021 के 48.02 प्रतिशत से घटकर 40.8 प्रतिशत रह गया, यानी 7.22 प्रतिशत की गिरावट। इसका बड़ा असर सीट की संख्या पर पड़ा और पार्टी की सीट 215 से घटकर 80 रह गईं, यानी तृणमूल को 135 सीट का नुकसान हुआ।

आयोग के आंकड़ों से यह भी पता चला कि जिन क्षेत्रों में मतदान 85 से 95 प्रतिशत के बीच रहा, वहां भाजपा ने 172 सीट जीतीं, जबकि तृणमूल को केवल 45 सीट से संतोष करना पड़ा।

आंकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में 95 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, वहां तृणमूल ने 37 सीट जीतीं, जबकि भाजपा को 28 सीट पर जीत मिली।

दो चरणों में हुए इस चुनाव में पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड औसत मतदान 92.47 प्रतिशत दर्ज किया गया, जिसे आयोग ने आजादी के बाद का सर्वाधिक आंकड़ा बताया।

चुनाव विश्लेषक शुभमय मैत्रा ने इन आंकड़ों को राज्य में हिंदू मतों के एकजुट होने और मुस्लिम मतों के बिखराव से जोड़ा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से ने भाजपा को समर्थन नहीं दिया, लेकिन उन्होंने ममता बनर्जी को भी वोट नहीं दिया तथा इसके बजाय उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर किसी तीसरे विकल्प को चुना।

मैत्रा के अनुसार, ‘‘मेरे आकलन में बहुसंख्यक समुदाय के मतों का ध्रुवीकरण पहले के लगभग 55 प्रतिशत से करीब 10 प्रतिशत और अधिक हो गया। साथ ही, अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा, जो सीधे भाजपा का समर्थन नहीं करता था, उसने तृणमूल कांग्रेस के बजाय अन्य विकल्प चुनकर परोक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचाया।’’

उन्होंने यह भी कहा, ‘‘सा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लेकर अल्पसंख्यकों के एक वर्ग में मौजूद उत्पीड़न का भय तृणमूल कांग्रेस के प्रति उनके असंतोष और उसके कथित कुशासन के कारण पीछे छूट गया।’’

उन्होंने अपने दावे के समर्थन में उत्तर दिनाजपुर जिले की मुस्लिम-बहुल करंदिघी विधानसभा सीट और नदिया जिले की कालीगंज सीट के चुनाव परिणामों का उदाहरण भी दिया।

भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय ने दावा किया कि पार्टी ने 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 12 सीट पर जीत हासिल की है, जिनमें चार ऐसी सीट भी शामिल हैं जहां अल्पसंख्यक आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है। ये सभी सीट मालदा और मुर्शिदाबाद क्षेत्रों से हैं।

उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, ‘‘यह कोई संकुचित या गढ़ा हुआ जनादेश नहीं है; यह व्यापक, स्पष्ट और विभिन्न क्षेत्रों में मतदाताओं की दृढ़ सोच पर आधारित (जनादेश) है।’’

भाषा सुरेश दिलीप

दिलीप


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