हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं : न्यायालय
हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं : न्यायालय
नयी दिल्ली, 24 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करने वाले लोगों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी से संकेत मिलता है कि प्रस्तावित विस्तार परियोजना के लिए 5,000 से अधिक परिवारों को विवादित जमीन खाली करनी होगी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि संबंधित भूमि से जुड़ा विवाद विभिन्न अदालतों में जा चुका है और रेलवे की अतिक्रमित जमीन पर गतिरोध को अनिश्चितकाल तक जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पीठ ने केंद्र और राज्य के प्राधिकारों को निर्देश दिया कि वे क्षेत्र में रहने वाले परिवारों की प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के लिए पात्रता सुनिश्चित करें।
शीर्ष अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी, हल्द्वानी के उप जिलाधिकारी और जिला स्तरीय विधि सेवा प्राधिकरण के सदस्यों सहित अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे क्षेत्र का दौरा करें और शिविर लगाएं, ताकि जमीन पर कब्जा करने वाले परिवारों की योजना का लाभ उठाने के लिए फॉर्म भरने सहित अन्य औपचारिकताएं पूरी करने में मदद की जा सके।
पीठ ने कहा कि अगर पात्र परिवार पीएमएवाई योजना के लिए आवेदन 31 मार्च तक जमा करें तो न्यायालय को खुशी होगी। उसने जिलाधिकारी और राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के सचिव को मामले में वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि उनके मुवक्किल हल्द्वानी रेलवे स्टेशन और उसके आसपास के क्षेत्र में पिछले चार से पांच दशकों से रह रहे हैं।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पहले कहा था कि वह इस क्षेत्र को विनियमित करेगी, लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं किया गया।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “यह एक सार्वजनिक भूमि है या यूं कहें कि यह रेलवे की जमीन है, जो एक निर्विवाद तथ्य है। वास्तव में आपको वहां रहने के लिए रियायत ही मिल रही है।”
उन्होंने कहा, “आप इसे वहां रहने का अधिकार नहीं बता सकते। आपको रियायत इसलिए मिल रही है, क्योंकि अधिकारी वर्षों तक अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज करते रहे।”
भूषण ने कहा कि विस्तार परियोजना के लिए सारी जमीन की जरूरत नहीं है और रेलवे या तो केवल उतनी ही जमीन ले सकता है, जितनी आवश्यक हो या परियोजना को स्थानांतरित कर सकता है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत रेलवे से परियोजना को स्थानांतरित करने के लिए नहीं कह सकती, क्योंकि यह विशेषज्ञों का काम है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि क्षेत्र में कई धार्मिक स्थल हैं और लोगों को वहां से हटाने से पहले उनका पुनर्वास किए जाने की जरूरत है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने गोंजाल्विस से कहा, “इन लोगों पर दया कीजिए। ये लोग अस्वच्छ परिस्थितियों में रह रहे हैं, जहां पीने योग्य पानी, बिजली और सीवेज की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्हें खुद तय करने दीजिए कि वे पीएमएवाई योजना के तहत आवास चाहते हैं या नहीं। और अगर कोई बाधा आती है, तो अदालत उसका समाधान करेगी।”
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि रेलवे के लिए विस्तार परियोजना आवश्यक है, क्योंकि हल्द्वानी से ऊपर पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं।
उन्होंने दलील दी कि कुछ साल पहले नदी का पानी पटरियों में घुस गया था, जिससे रेलवे के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा था।
भाटी ने कहा कि पात्र विस्थापित परिवारों को पीएमएवाई योजना के तहत उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में आवास उपलब्ध कराए जा सकते हैं और अगर आवश्यक हो तो उन्हें छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपये भी दिए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इलाके के 13 निवासियों के पास अपनी जमीन है और राज्य सरकार उन जमीनों का अधिग्रहण करेगी।
पीठ ने मामले की सुनवाई अप्रैल तक स्थगित कर दी।
शीर्ष अदालत ने 24 जुलाई 2024 को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करने वाले 50,000 से अधिक लोगों के पुनर्वास के लिए केंद्र और रेलवे के अधिकारियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया था।
रेलवे ने साल 2024 में उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर पांच जनवरी 2023 के उस आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया था, जिसके तहत हल्द्वानी में रेलवे के दावे वाली 29 एकड़ भूमि से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी गई थी।
याचिका में अनुरोध किया गया था कि रेल परिचालन को सुगम बनाने के लिए भूमि का एक टुकड़ा तत्काल आधार पर उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि पटरियों की सुरक्षा करने वाली एक दीवार 2023 के मानसून के मौसम के दौरान गिर गई थी।
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को बुनियादी ढांचे के उन्नयन और रेलवे लाइन के स्थानांतरण के लिए जरूरी भूमि के टुकड़े की पहचान बिना किसी देरी के करने का निर्देश दिया था। उसने उन परिवारों की पहचान करने के लिए भी कहा था, जिनके बेदखली के कारण प्रभावित होने की आशंका है।
रेलवे के मुताबिक, संबंधित जमीन पर 4,365 अतिक्रमणकारी हैं, जो हल्द्वानी में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे इसके असली मालिक हैं।
विवादित भूमि पर चार हजार से अधिक परिवारों के लगभग 50,000 लोग रहते हैं, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम हैं।
शीर्ष अदालत ने हल्द्वानी में रेलवे के दावे वाली 29 एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर पांच जनवरी 2023 को यह करते हुए रोक लगा दी थी कि यह एक “मानवीय मुद्दा” है और 50,000 लोगों को रातोंरात विस्थापित नहीं किया जा सकता।
उच्च न्यायालय ने 20 दिसंबर 2023 के अपने आदेश में कहा था, “रेलवे अधिकारी जिला प्रशासन के समन्वय से और अगर आवश्यक हो तो किसी अर्धसैनिक बल के साथ मिलकर, रेलवे भूमि पर कब्जा करने वालों को एक सप्ताह का नोटिस देने के बाद, उन्हें उपर्युक्त अवधि के भीतर भूमि खाली करने के लिए कहेंगे।”
भाषा पारुल पवनेश
पवनेश

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