अरावली में अतिक्रमण, अवैध खनन से वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर असर : रिपोर्ट
अरावली में अतिक्रमण, अवैध खनन से वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर असर : रिपोर्ट
नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) अरावली पर्वतमाला में अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी बुनियादी ढांचे के विस्तार ने भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर असर डाला है। एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई।
रिपोर्ट में कहा गया कि 1980 के दशक से पहले विशेषकर सरिस्का और बरदोद वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास बड़े पैमाने पर वन भूमि में बदलाव के कारण प्राकृतिक वन आवरण में भारी गिरावट आई, जिससे महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों और जलग्रहण क्षेत्रों का विखंडन हुआ।
अरावली परिदृश्य के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन पर यह शोध सांकला फाउंडेशन द्वारा भारत में डेनमार्क दूतावास और हरियाणा राज्य वन विभाग के सहयोग से किया गया था।
इस अध्ययन में अरावली क्षेत्र में पारिस्थितिक गिरावट से निपटने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया, जिसमें पर्यावरणीय स्थिरता को जैव विविधता संरक्षण, जलवायु लचीलापन, आजीविका सुरक्षा और मानवाधिकारों से जोड़ा गया।
अरावली पर्वतमाला, जो विश्व स्तर पर सबसे पुरानी पर्वत श्रंखलाओं में से एक है, भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और सिंधु-गंगा के मैदानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक अवरोध और जीवन-निर्वाह में मदद करने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा बुधवार को जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हालांकि, चार राज्यों और 29 जिलों में फैला यह नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, जो 5 करोड़ से अधिक लोगों का घर है, वनों की कटाई, तेजी से शहरीकरण सहित अस्थिर भूमि उपयोग और व्यापक भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण के कारण गंभीर खतरे में है।’
अध्ययन में कहा गया है, ‘अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी अवसंरचना के विस्तार ने इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु विनियमन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और अरावली की हरित अवरोध के रूप में कार्य करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है, जिससे मरुस्थलीकरण में तेजी आई है और उत्तरी मैदानों की पारिस्थितिकी स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है।’
संकला फाउंडेशन की यह पहल गुरुग्राम के अरावली क्षेत्र में स्थित चार गांवों के एक प्रायोगिक क्षेत्र में स्थल-विशिष्ट, साक्ष्य-आधारित और समुदाय-समावेशी पारिस्थितिकी बहाली मॉडल के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान करती है जो जिले के दक्षिणी भाग पर केंद्रित है।
भाषा तान्या नरेश
नरेश

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