कर्नाटक के एकीकरण के 68 साल बाद भी कन्नड़ के विकास के लिए अनुकूल माहौल नहीं : सिद्धरमैया
कर्नाटक के एकीकरण के 68 साल बाद भी कन्नड़ के विकास के लिए अनुकूल माहौल नहीं : सिद्धरमैया
बेंगलुरु, 17 अक्टूबर (भाषा) मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने पूर्ववर्ती ‘मैसूर राज्य’ के एकीकरण के 68 साल बाद और राज्य को ‘कर्नाटक’ नाम मिलने के 50 साल बाद भी कन्नड़ भाषा के विकास के लिए अनुकूल माहौल की कमी पर मंगलवार को अफसोस जताया।
कन्नड़ भाषियों को ‘‘बहुत अधिक उदार’’ बताते हुए उन्होंने कहा कि यह ‘‘कमी’’ कन्नड़ भाषा, इसकी संस्कृति और परंपराओं के विकास में बाधा बन रही है।
सिद्धरमैया ने ‘कर्नाटक सुवर्ण संभ्रम’ का लोगो जारी करने के दौरान कहा, ‘‘हम दूसरों को अपनी भाषा नहीं सिखाते, बल्कि हम उनकी भाषा सीखते हैं। हमें दूसरों को अपनी भाषा सिखानी चाहिए। हम उर्दू बोलने वालों के साथ उर्दू में बात करते हैं, हिंदी बोलने वालों के साथ हिंदी में बात करते हैं और तमिल लोगों के साथ तमिल में बात करते हैं ।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं कहूंगा कि यह राज्य की भाषा, संस्कृति और परंपरा के विकास के लिए अच्छा बदलाव नहीं है।’’
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘यहां रहने वाले हर व्यक्ति को कन्नड़ बोलना सीखना चाहिए। हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम कन्नड़ के लिए माहौल और आवश्यकता बनाएं, लेकिन हमने ऐसा प्रयास नहीं किया।’’
इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि कोई भी कन्नड़ जाने बिना यहां आसानी से गुजारा कर सकता है।
सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘क्या हम तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल या उत्तर प्रदेश में केवल कन्नड़ में बात करके गुजारा कर सकते हैं? हालांकि, कर्नाटक में कोई भी कन्नड़ जाने बिना ऐसा कर सकता है। पड़ोसी राज्यों की तुलना में हमारे यहां यही अंतर है। हम कन्नड़ काफी उदार हैं।’’
उन्होंने कहा कि वह लोगों को अन्य भाषाएं सीखने या बोलने से मना नहीं करेंगे, लेकिन उन्हें यह एहसास होना चाहिए कि कर्नाटक में कन्नड़ बोलने के लिए माहौल बनाने की जरूरत है और यह एक आवश्यकता है।
भाषा शफीक नरेश
नरेश

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